By Malay Nirav & Pooja Kumari

आपकी निजता का न होना ही आधुनिक होना है! आज कल यह सवाल गौण होता जा रहा है कि क्या ईश्वर होते हैं ? आज प्रमुख प्रश्न यह है कि आपकी निजता आपकी है या वह सार्वजनिक हो चुकी है। निजता कोरी कल्पना है या वास्तविकता, अब यह सवाल जेहन में रोमांच पैदा करता है। इसके साथ ही कुछ और सवाल भी सिर उठाकर चले आते हैं जैसे, कहाँ तक निजता का मौलिक अधिकार प्रासंगिक है या जीवन में निजता क्यों आवश्यक है या निजता-विहीन जीवन कैसा होगा या फ़िर निजता किस चिड़िया का नाम है?


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देश 15 अगस्त 1947 को आज़ाद हुआ था, लेकिन एक आम भारतीय नागरिक निजी या व्यक्तिगत रुप से 24 अगस्त 2017 को स्वतंत्र हुआ। आप सोच रहे होंगे कि ऐसी कैसी आजादी मिली जिससे अधिकतर आम नागरिक अनभिज्ञ है, शायद आप भी या फ़िर इस लाईन को लिखने वाला कलमकार भी! इसी दिन ( 24 अगस्त 2017 ) नौ जजों वाली सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से "निजता के अधिकार" को मौलिक अधिकार बताया था। नौ जजों का एक मुद्दे पर आम सहमति बन जाना एक दुर्लभ घटना है। पीठ के नौ माननीय जज हैं; मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर, जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस एस.ए. बोबडे, जस्टिस आर.के. अग्रवाल, जस्टिस आर.एफ़. नरीमन, जस्टिस ए.एम. सप्रे, जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर। इस ऐतिहासिक फैसले पर चर्चा करने से पहले निजता का 'मौलिक अधिकार' बनने की यात्रा पर एक नज़र डाल लेना श्रेयस्कर हो सकता है। आइए एक नज़र डालते हैं निजता के निजी अतीत पर।


निजता क्या है, अब तक इसकी कोई एक सर्वसम्मत परिभाषा नहीं गढ़ी जा सकी। सरल शब्दों में कहें तो निजता किसी व्यक्ति द्वारा तय वह सीमा है जिसके आगे वह किसी अन्य व्यक्ति या संस्था का हस्तक्षेप नहीं चाहता है। इस ऐतिहासिक निर्णय में कोर्ट ने भी निजता की कोई परिभाषा देने से इनकार किया है। कोर्ट का मानना है कि परिभाषा देने से निजता का आयाम सीमित हो जाएगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय परिप्रेक्ष्य में निजता को तीन आयामों के अंतर्गत पाया। इसमें पहली है, व्यक्ति से संबंधित निजता जिसमें व्यक्ति के शरीर से जुड़ी निजता शामिल है। दूसरी है, सूचना से जुड़ी निजता, यह व्यक्ति के मस्तिष्क एवं विचारों से जुड़ी निजता है और तीसरी है, व्यक्तिगत चयन की निजता, यह व्यक्ति के मन से जुड़ी निजता है। साथ ही निजता की श्रेणी का एक झलक देते हुए न्यायालय ने कहा कि निजता के अधिकार में व्यक्तिगत रुझान और पसंद को सम्मान देना, पारिवारिक जीवन की पवित्रता, शादी करने का फैसला, बच्चे पैदा करने का निर्णय, जैसी बातें शामिल हैं।


विश्व इतिहास पर दृष्टि डाले तो निजता के अधिकार के विमर्श का जन्म 1890 ई में वारेन और ब्राण्डैस द्वारा लिखे लेख 'राइट टू प्राइवेसी' से होता है। 'हॉवर्ड लॉ रिव्यू' में छपे इस लेख में निजता को प्रारंभिक तौर पर गोपनीयता के रुप में देखा गया। वारेन और ब्राण्डैस ने अपने लेख में बताया कि निजता में चार तत्वों का समावेश किया जा सकता है जिनमें शामिल है; एकान्तता का अधिकार, अहस्तक्षेप का अधिकार, निजी सूचना तक अवांछित पहुँच से सुरक्षा का अधिकार और सूचना की गोपनीयता का अधिकार।


प्रारंभ में निजता को केवल वैधानिक अधिकार के तौर पर देखा गया था। लेकिन सन् 1953 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक निर्णय में माना गया कि निजता वास्तव में एक मौलिक अधिकार है। संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र के अनुच्छेद 12 में निजता को एक अधिकार के रुप में चिन्हित किया गया है। साथ ही संयुक्त राष्ट्र के नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के धारा 17 में भी इसे स्थान दिया गया है। आज़ादी से पहले ही भारत में निजता को लेकर चर्चा देखने को मिलती है। 1925 के कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिया बिल के दौरान महात्मा गाँधी ने एक अधिकार के रुप में इसकी वकालत की थी। मार्च 1947 में डॉ भीमराव अंबेडकर ने इसे सभ्य समाज की आवश्यक्ता माना था। बाबा साहब का यह भी मानना था कि यदि बहुत आवश्यक हो तो न्यायालय की देख-रेख में ही इस पर कोई युक्ति-युक्त निर्बन्धन लगाया जाए। इस संदर्भ में सबसे बड़ी पहल हमें 1954 में एम.पी.शर्मा केस में देखने को मिलती है। इस केस में आठ जजों की बेंच द्वारा यह निर्धारित किया गया था कि निजता कोई मौलिक अधिकार नहीं है। इसी प्रकार का निर्णय 1962 में खड़गसिंह बनाम उत्तर प्रदेश वाद में 6 जजों की बेंच द्वारा दिया गया था। हालांकि इसके बाद के केसों जैसे गोविंद बनाम मध्य प्रदेश, मेनका गाँधी वाद जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार को स्वीकारा था परंतु साथ ही निजता के अधिकार पर नैतिकता और सामाजिक कारकों के आधार पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने की बात भी कही थी। हालांकि कोर्ट ने निजता को मौलिक अधिकार का हिस्सा मानने से परहेज ही किया। 24 अगस्त 2017 को इतिहास में पहली बार नौ जजों की संवैधानिक पीठ ने के.एस.पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले में एम.पी.शर्मा एवं खड़गसिंह केस के फैसले को पलटते हुए निजता को मूल अधिकार मान लिया।


के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले में जजों के फैसले को पढ़ते हुए आप खुद को एक बेहतरीन कविता में खोते हुए महसूस कर सकते हैं या फ़िर आपको ऐसा लग सकता है जैसे आप किसी शानदार किताब का पन्ना पलट रहे हैं। यह फैसला न सिर्फ़ अपनी व्यापक महत्ता बल्कि लेखनी की श्रेष्ठता के तौर पर भी बार-बार देखा जाता रहेगा। इस फैसले में जज ने बताया कि संविधान के बगीचे में अलग-अलग अधिकारों से जो खुशबू आ रही है वह निजता के अधिकार की खुशबू है। इस खुशबू के बगैर संविधान की बगिया की रौनक फीकी पड़ जाएगी। इस ऐतिहासिक फैसले में कही गई प्रमुख बातों में से कुछ निम्नवत हैं;

  1. न्यायालय ने कहा है कि दरअसल इस मामले की सुनवाई के दौरान एटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल का कहना था कि निजता एक इलीट अवधारणा है, यानी प्राइवेसी खाते-पीते घरों की बात है और निजता का विचार बहुसंख्यक समाज की ज़रूरतों से मेल नहीं खाता। लेकिन संविधान के पहरेदार उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ज़रूरतमंद लोगों को बस आर्थिक तरक्की चाहिए, नागरिक एवं राजनैतिक अधिकार नहीं, यह कहना उचित नहीं है।
  2. शीर्ष अदालत ने अपने निर्णय में कहा है कि जीने का अधिकार, निजता का अधिकार और स्वतंत्रता का अधिकार, को अलग-अलग करके नहीं बल्कि एक समग्र रूप में देखा जाना चाहिए। न्यायालय के शब्दों में, “निजता मनुष्य के गरिमापूर्ण अस्तित्व का अभिन्न अंग है और यह सही है कि संविधान में इसका जिक्र नहीं है, लेकिन निजता का अधिकार वह अधिकार है, जिसे संविधान में गढ़ा नहीं गया बल्कि मान्यता दी है।"
  3. संविधान निजता के अधिकार को संरक्षण देता है क्योंकि यह जीवन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक बाईप्रोडक्ट है। निजता का अधिकार, स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीने के अन्य मौलिक अधिकारों के साहचर्य में लोकतंत्र को मज़बूत बनाएगा।
  4. किसी का अकेले रहने का अधिकार भी निजता के तहत आएगा। निजता का अधिकार किसी व्यक्ति की निजी स्वायत्तता की सुरक्षा करता है और जीवन के सभी अहम पहलुओं को अपने तरीके से तय करने की आज़ादी देता है।
  5. न्यायालय ने यह भी कहा है कि अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर हो तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह निजता का दावा नहीं कर सकता।
  6. अन्य मूल अधिकारों की तरह ही निजता के अधिकार में भी युक्तियुक्त निर्बंधन की व्यवस्था लागू रहेगी, लेकिन निजता का उल्लंघन करने वाले किसी भी कानून को उचित और तर्कसंगत होना चाहिए।
  7. न्यायालय ने यह भी कहा है कि निजता को केवल सरकार से ही खतरा नहीं है बल्कि गैर-सरकारी तत्त्वों द्वारा भी इसका हनन किया जा सकता है। अतः सरकार डेटा संरक्षण का पर्याप्त प्रयास करे।
  8. न्यायालय ने सूक्ष्मता से अवलोकन करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति के बारे में जानकारी जुटाना उस पर काबू पाने की प्रक्रिया का पहल कदम है। अतः ऐसी सूचनाएँ कहाँ रखी जाएंगी, उनकी शर्तें क्या होंगी, किसी प्रकार की चूक होने पर जवाबदेही किसकी होगी? इन पहलुओं पर गौर करते हुए कानून बनाया जाना चाहिए।


न्यायालय द्वारा दिए गए इस आदेश के पश्चात् राज्य बनाम नागरिक अधिकार की लोकतांत्रिक बहस में अब नागरिक का पलड़ा कहीं ज्यादा भारी हो गया है और यह बात किसी भी लोकतंत्र के लिए लाभदायक है। निजता का मौलिक अधिकार होने की घोषणा, राज्य की नियामकीय भूमिका को संतुलित करेगी और इससे राज्य को निरंकुश होने से रोका जा सकेगा। हमें यह समझना होगा कि आर्थिक सुधारों के नाम पर राजनीतिक अधिकारों की बलि नहीं ली जा सकती है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की एक साथ प्रस्तावना करती है, अलग-अलग नहीं।

भवन की नींव पड़ जाना, फ़िर उसका बन जाना ही काफी नहीं होता है, बल्कि उसमें रहने वालों को समय-समय पर उसकी साफ़-सफ़ाई भी करनी होती है। ठीक वैसे ही निजता को मौलिक अधिकार में शामिल कर लिया जाना ही काफी नहीं है, बल्कि इसे आम जीवन में क्रियान्वित भी होना चाहिए। 


( मौलिक अधिकार और हमारी प्राइवेसी श्रृंखला का दूसरा भाग 2 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें )