By Prabhakar
लम्बे समय बाद बीते गुरूवार को जम्मू-कश्मीर में इन्टरनेट की 4G सेवा दुबारा शुरू कर दी गयी। इस राज्य में मोबाइल इंटरनेट सेवा 4 अगस्त 2019 को पूरी तरह बंद कर दी गई थी और उसके बाद जनवरी 2020 में घाटी में लो-स्पीड 2G इंटरनेट सेवा शुरू की गई। जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 खत्म किये जाने के दौरान भारत सरकार द्वारा यह फैसला लिया गया था।
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| Photo Credit: The Print |
पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट कर कहा, "4G मुबारक! अगस्त 2019 के बाद पहली बार जम्मू-कश्मीर के लोग 4जी मोबाइल डेटा का इस्तेमाल कर पाएंगे। कभी नहीं से बेहतर देर से सही।” 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाये जाने के बाद उमर अब्दुल्ला, फारुक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को हिरासत में ले लिया गया था। इन्हें करीब एक साल बाद ही हिरासत से रिहा किया गया था।
4G Mubarak! For the first time since Aug 2019 all of J&K will have 4G mobile data. Better late than never.
— Omar Abdullah (@OmarAbdullah) February 5, 2021
10 जनवरी 2020 को इंटरनेट पर लगी पाबंदी हटाने वाली एक जनहित याचिका की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने “इंटरनेट” को संविधान के आर्टिकल 19 के तहत दिया गया अधिकार बताया था और इंटरनेट को “अभिव्यक्ति के अधिकार का हिस्सा” माना था। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि लोगों को असहमति जताने का पूरा अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में लम्बे समय (4 अगस्त 2019) से लागू धारा 144 का जिक्र करते हुए कहा था कि इसका भी ‘इस्तेमाल’ सोच-विचार कर ही किया जाना चाहिए और विरोधी विचार को कुचलने के औज़ार के रूप में इसका ‘दुरुपयोग’ बिलकुल नहीं होना चाहिए।
केंद्र सरकार ने कश्मीर घाटी में आतंकी हिंसा का हवाला देते हुए कहा था कि कई सालों से सीमा पार से आतंकवादियों को यहां भेजा जाता था, स्थानीय उग्रवादी और अलगाववादी संगठनों ने पूरे क्षेत्र को बंधक बना रखा था और ऐसी स्थिति में अगर सरकार नागरिकों की सुरक्षा के लिए एहतियाती कदम नहीं उठाती तो यह ‘मूर्खता’ होती। जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 खत्म किये जाने के बाद दो केन्द्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में “एक देश एक संविधान” लागू हो गया लेकिन जो बदलाव हुए क्या उससे इन राज्यों के लोग खुश हैं !
इस सवाल का जवाब तलाश करते हुए बीबीसी ने अपने एक ग्राउंड रिपोर्ट में बताया कि जम्मू-कश्मीर के निवासियों को अपने भविष्य पर संकट नज़र आ रहा है और वे अपने रोज़गार और पारम्परिक व्यवसाय को लेकर काफी चिंतित हैं उनका मानना है कि विशेष राज्य का दर्जा खत्म किये जाने के बाद राज्य में बाहरी लोग भी दाखिल होने लगेंगे और उन्हें सरकारी रोज़गार मिलने में कठिनाई आयेगी और उनके हाथों का काम भी उनसे छिन जायेगा।
जब केंद्र सरकार ने 5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 और 35-A को निरस्त किया उसी दिन से यहां रहने वाले विस्थापित कश्मीरी पंडित परिवार अपने 'घर वापसी' का सपना देखने लगे थे। केन्द्र शासित प्रदेश (जम्मू-कश्मीर) पर बीबीसी हिंदी द्वारा 2 अगस्त 2020 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक कश्मीरी पंडित समुदाय की अगुवाई करने वाली प्रमुख संस्था पनुन कश्मीर के वरिष्ठ नेता डॉक्टर अग्निशेखर ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा था, "जहां केंद्र सरकार ने 5 अगस्त 2019 को इतना बड़ा ऐतिहासिक फ़ैसला ले लिया वहीं दूसरी ओर बीते एक साल से कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास को लेकर उन्होंने अब तक कोई पहल नहीं की।"
अनुच्छेद 370 को हटाये जाने के बाद पिछले साल नवंबर माह में जम्मू-कश्मीर में पहली बार हुए जिला विकास परिषद् (DDC) चुनाव पर पूरे देश की नज़रे टिकी थीं। हालाँकि इस तरह के चुनाव को अन्य राज्यों में बहुत महत्व नहीं दिया जाता लेकिन इस चुनाव में जम्मू-कश्मीर के कई दिग्गज नेताओं की साख दाँव पर लगी थी। चुनाव परिणाम में पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने कश्मीर क्षेत्र में अपना खाता खोल खुशी से गदगद हुई और जम्मू-कश्मीर में गुपकार समूह के बाद बीजेपी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई।
एनडीटीवी द्वारा 2 फरवरी 2021 को प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि जम्मू एवं कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद इस संघ शासित क्षेत्र में पर्यटकों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई और इसका सबसे अधिक असर कश्मीर घाटी में हुआ है। पर्यटन मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने कहा, ‘‘पांच अगस्त 2019 से जम्मू एवं कश्मीर में आने वाले पर्यटकों की संख्या में गिरावट आई है। जम्मू की तुलना में यह प्रभाव कश्मीर घाटी में अधिक दिखा, हालांकि पिछले कुछ माह से जम्मू एवं कश्मीर में पर्यटक आगमन में क्रमिक रूप से वृद्धि हो रही है। ''उन्होंने बताया कि जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख संघ शासित क्षेत्र के प्रशासन के अनुसार-अगस्त 2019 से अब तक कश्मीर में 84, 326 पर्यटक आए जबकि जम्मू में 87,94,837 और लद्दाख में 1,00,931 पर्यटक आए।
जब पूरे देश में कोरोना वायरस वैक्सीन देने की शुरुआत की गई ठीक उसी समय स्वास्थ्य विभाग की ओर से नोवल कोरोना वायरस महामारी (COVID-19) से बचाव के लिए जम्मू-कश्मीर और श्रीनगर में भी 16 जनवरी, 2021 से ही टीकाकरण अभियान की शुरूआत कर दी गई। यहाँ के लोग इस बात से भी काफी खुश नज़र आये । यहाँ के लोग उम्मीद करते हैं कि अन्य राज्यों की तरह उनके लिए भी सुलभ स्वास्थ्य सेवायें उपलब्ध होंगी और उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा।
दी कश्मीरियत के लिए कश्मीर में काम कर चुकीं भवानी इतिकला बताती हैं “कश्मीर के लोग अनुच्छेद 370 को हटाये जाने से खुश नहीं रहते। यहाँ के लोगों का मानना है कि अब बाहर के लोग भी आकर यहाँ बसने लगेंगे और हमारे रीति-रिवाज़ों को भी प्रभावित करेंगे जिससे हमारी सांस्कृतिक विरासत को नुकसान पहुँचेगा। यहाँ के लोगों का कहना हैं कि कश्मीर को मुख्यधारा से जोड़ने के बहाने राजनीतिक पार्टियों ने अपना लाभ साधा है।” भवानी इतिकला आगे बताती हैं कि “यहाँ के लोगों का मानना है कि वे स्वास्थ्य, शिक्षा और रोज़गार जैसी आधार-भूत पर्याप्त सुविधाओं से वंचित हैं। अभी यहाँ विकास न के बराबर हुआ है। यहाँ के लोगों की ज़रूरतें अलग हैं और राजनीतिक पार्टियाँ अपना-अपना वोट बैंक तैयार करने के नये-नये तरीके आज़मा रहीं हैं।” यहाँ के लोग चाहते हैं उनकी आवाज़ सुनी जाये शायद इसीलिए कश्मीरी लोग पत्रकारों का बहुत सम्मान करते हैं और पत्रकारिता में बहुत विश्वास भी रखते हैं। शायद उनकी उम्मीद लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ से बंधी है।”

