By Pooja Kumari & Malay Nirav
बालों में रंग-बिरंगे फूल, मासूम व तेजस्वी चेहरा, गुड़िया जैसी दिखती एक अधेड़ उम्र की लड़की, दुबला पतला शरीर पर मन से बाघिन, शान्ति का नोबेल पुरस्कार से सम्मानित, आंग सान सू की! लगभग 15 वसंत-पतझड़ नजरबंदी में व्यतीत कर चुकीं 'सू की' एक बार फ़िर से नजरबंद हैं! आखिर क्यों? क्या 'सू की' 27 साल का, नेल्सन मंडेला का रिकॉर्ड तोड़ सकती हैं? नहीं, काश ऐसा न हो, और वह जल्द से जल्द आज़ाद हो जायें, यही लोकतांत्रिक विश्व के लिए श्रेयस्कर होगा।
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| Photo Credit: BBC |
'सू की' से शायद मेरा परिचय 2012 में हुआ था! न-न, ठहरिये, एकतरफा परिचय! सिर्फ़ मैं उनको जानता हूँ न कि वो मुझे, 2012 से, जब 1991 में मिले शान्ति का नोबेल पुरस्कार ले रही थी। अखब़ार से लेकर टी. वी. हर जगह वह छाई हुई थीं। इन्हीं माध्यम से मैं उनसे रु-ब-रू हुआ था। क्या यादगार पल थे वो, पूरी दुनिया के लिए, जब वे 21 साल की नजरबंदी के बाद मुक्त होकर घूम पा रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा विश्व ही लोकतंत्रमय हो गया है। पुरस्कार समारोह में दिया गया, उनका भाषण विश्व में एक नई आशा और आत्मविश्वास भर रहा था। उन्होंने अपने नोबेल सम्बोधन में कहा था- "हमारा मकसद एक ऐसी दुनिया बनाना है, जहां कोई विस्थापित न रहे। जहां लोगों को शरणार्थी न बनाया जाए। जहां कोई बेघर और नाउम्मीद न हो। एक ऐसी दुनिया बनाएं, जिसका हर कोना लोगों को सुकून भरी पनाह दे सके। जहां रहने वाले लोगों को आज़ादी मयस्सर हो। जहां हर कोई शान्ति से जी सके।"
'आंग सान सू की' का जीवन एक रोचक गाथा की तरह है। वे आधुनिक विश्व की कुछ एक श्रेष्ठ महिला नायकों में से एक हैं। मुझे की, की दो बातें कुछ ज्यादा ही आकर्षित करती हैं पहला, वे दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ी हैं, जहां से मैं भी पढ़ा हूँ। दूसरा, उनकी वजह से मैं हिन्दी में पहली बार दो “की" को एक साथ देख पाया था, जो आप पिछले लाईन में भी देख सकते हैं। यह मेरे लिए किसी अजूबा से कम नहीं था। मैं उन्हें म्यांमार की रानी लक्ष्मीबाई मानता हूँ।
घर में नजरबंद! इन शब्दों से हम लोग भी भली-भांति परिचित हैं, अपने स्वर्ग जम्मू-कश्मीर की वजह से! हमारे यहां भी आए दिन लोग घर में नजरबंद होते रहते हैं, लेकिन यह विडंबना ही है कि हमारे यहां के नजरबंदी को आज तक नोबेल पुरस्कार नहीं मिल पाया है। यहां “घर में नजरबन्द” का जिक्र क्यों हो रहा है, यह आप अब तक समझ चुके होंगे। एक बार फ़िर से म्यांमार की लक्ष्मीबाई 'की' घर में नजरबंद हैं और म्यांमार तानाशाह की गिरफ्त में। “घर में नजरबंद” से मुझे एक रोमानी अवधारणा की खुशबू आती है। कृपया इससे आप यह मत समझ लेना कि मैं 'आंग सान सू की' की भव्यता को कमतर कर रहा हूँ। बात यह है कि मैं बचपन से घर में बन्द होकर सारे सुख-सुविधा के साथ जीवन व्यतीत करने का ख्वाब देखता आया हूँ, जहां कोई काम नहीं हो, हो तो बस आराम। अगर कोई व्यक्ति आपके ख्वाबों वाली जिन्दगी को जीता है फ़िर तो आप उसे रोमानी ही मानेगें ना। वैसे कोरोनाकाल में पूर्णबन्दी में हमें कुछ-कुछ घर में नजरबंद होने का एहसास हुआ था, अगर आप जम्मू-कश्मीर में थे तो पूर्णबन्दी के साथ नेट-कॉल-मैसेज-बन्दी का भी फ़ायदा उठा पाए होंगे। उस समय आप थोड़े और करीब से महसूस कर रहे होंगे “घर में नजरबंद” अवधारणा को!
हर किसी के व्यक्तित्व में कोई न कोई स्याह पहलू होता ही है। नोबेल पुरस्कार लेते समय 'की' के भाषण का अंश है, "हमारा मकसद एक ऐसी दुनिया बनाना है, जहां कोई विस्थापित न रहे। जहां लोगों को शरणार्थी न बनाया जाए। जहां कोई बेघर और नाउम्मीद न हो।" क्या 'की' अपने द्वारा कही इन बातों को भूल गयीं, जब वो सत्ता में थीं? म्यांमार की स्टेट काउंसलर बनने के बाद से 'आंग सान सू की' ने म्यांमार के अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में जो रवैया अपनाया, उसकी काफ़ी आलोचना हुई। बात 2017 की है। 25 अगस्त, 2017 को अराकान रोहिंग्या मुक्ति सेना (ARSA) ने उत्तरी रखाइन प्रांत में 30 पुलिस चौकियों पर हमला किया जिसमें लगभग 12 सुरक्षा कर्मियों की मृत्यु हुई और कई अन्य घायल हो गए। इसके बाद अगस्त 2017 में ही रोहिंग्या लोगों के खिलाफ की गई कार्रवाई में सेना पर बड़ी संख्या में रोहिंग्या लोगों के घर जलाने और उनकी सामूहिक हत्या-बलात्कार जैसे गंभीर आरोप लगे, इस दौरान लाखों (लगभग 7,45,000) रोहिंग्या लोगों ने पड़ोसी देशों में शरण ली। विश्व के विभिन्न देशों ने इस कार्रवाई की निंदा की तथा संयुक्त राष्ट्र ने इसे “राज्य-प्रायोजित जनसंहार” की संज्ञा दी। 'सू की' ने 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में हुई सुनवाई के दौरान सेना की कार्रवाई का समर्थन किया था। उनका यह बयान उनकी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति को न केवल कम किया बल्कि उनसे शान्ति का नोबेल पुरस्कार वापस लेने की माँग भी उठने लगी थी।
कुछ लोगों ने तर्क दिया कि वह एक समझदार राजनेता हैं जो कि एक ऐसे बहु-जातीय देश का शासन चलाने की कोशिश कर रही हैं, जिसका इतिहास काफ़ी जटिल है। हालांकि, म्यांमार में आंग सान सू की को “द लेडी” की उपाधि हासिल है और बहुसंख्यक बौद्ध आबादी में वह अभी भी काफ़ी लोकप्रिय हैं लेकिन ये बहुसंख्यक समाज रोहिंग्या समाज के लिए बेहद कम सहानुभूति रखता है। क्या महात्मा गाँधी सत्ता वाली राजनीति की इस विसंगति को पहचान लिए थे तभी इससे दूर रहने का फैसला किया था? क्या 'की' भी सत्ता के इस चक्रव्यूह में फँस गयी हैं? 'आंग सान सू की' की क्या मजबूरी थी जो न केवल उन्हें अपने बनाये हुए राहों से पृथक किया बल्कि हिंसा तक का समर्थन कर देने को मजबूर किया? क्या यही लोकतंत्र में बहुसंख्यकवाद का नकारात्मक पहलू है? ऐसे सवाल तो बहुतेरे हैं लेकिन जवाब, शायद मिलने बाकी हैं...
एक तरफ़ जहाँ रोहिंग्या-प्रसंग ने की की वैश्विक प्रतिष्ठा को धूमिल किया था, वहीं उनकी नजरबंदी ने उन्हें एक बार फ़िर से वैश्विक सहानुभूति और सम्मान का पात्र बना दिया। आज पूरी दुनिया 'की' के साथ खड़ी हो गयी है। म्यांमार की जनता भी की के लिए सड़क पर उतर आयी हैं। उम्मीद है कि जल्द ही की और म्यांमार से तानाशाही की कालिमा हटेगी एवं म्यांमार की के भाषण जैसा सुनहला बनकर उभरेगा।

