By Malay Nirav

 "जल ही जीवन है" को बदलकर अब "जितना जल उतना ही जीवन" हो जाना चाहिए। एक समय था, शायद यह समय आपके जीवन में भी आया होगा, जब प्यास लगती थी, हाथ को ही ग्लास बना नलकूप से पानी पी लेता था। कोई डर नहीं था, पीने से पहले कभी भी यह नहीं सोचता था कि कितना आयरन है, कितना आर्सेनिक। प्यास बस पानी खोजता था, शुद्धता तो पानी का बाई प्रोडक्ट था। दिल-दिमाग में यह प्रश्न कभी नहीं आता था कि क्या यह पानी शुद्ध-स्वच्छ और पीने योग्य है ? समय बदला और आज हम पानी से ज्यादा उसकी शुद्धता का ख्याल रखने लगे। नलकूप के पास जाने पर हज़ार बार सोचते हैं कि क्या यहां का पानी पी सकते हैं ? आखिर कब प्लास्टिक की बोतल में भरा पानी और उस पर छपे येन केन प्रकारेण कम्पनी का नाम हमारी जिन्दगी का हिस्सा बन गए, पता ही नहीं चला। एक मुहावरा प्रचलित है, 'पानी के भाव'। यह मुहावरा अपने दिन गिन रहा है। शायद, जल्द ही अप्रासंगिक भी हो जाएगा। क्या आपको भी ऐसा लगता है ? अब तो 'पानी के भाव' पानी भी नहीं बिकता है।


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दुनिया का सातवां अजूबा, ताजमहल, किसी परिचय का मोहताज नहीं है। लगभग 350 साल पहले यमुना नदी के तट पर बना यह ऐतिहासिक धरोहर बेहद ही आकर्षक और खूबसूरत है। अगर आज ताजमहल बनवाना होता तो क्या शाहजहाँ यमुना नदी का वही तट चुनते ! छोड़िये ताजमहल को, क्या आप अपना एक छोटा-सा आशियाना देश के दिल से प्रवाहित हो रही यमुना नदी के तट पर बनवाना चाहेंगे ! एक से बढ़कर एक पुरानी सभ्यता; चाहे सिंधु घाटी सभ्यता हो या फ़िर मिस्र, मेसोपोटामिया, ग्रीस आदि सभ्यता सभी नदियों के किनारे बसे और आबाद हुए। लेकिन आज हमारी अधिकतर नदियां प्रदूषित हो चुकी है। वहां बसना तो दूर की बात है, खुली आँख और नाक के साथ सैर करना तक मुश्किल प्रतीत होता है। ये नदियां नाले में तब्दील होती जा रही हैं। भूजल हो या सतही जल, ( नदी, झील, तालाब, पोखर आदि ) सभी सुख रहे हैं नहीं तो प्रदूषित हो रहे हैं। गंगा नदी के जल को इतना साफ़ और पवित्र माना जाता है कि लोग उससे आचमन करते हैं। लेकिन आज अधिकतर जगहों पर गंगा नदी का जल आचमन का छोड़िये पशुओं के स्नान के लायक तक नहीं बचा है।

बूंद-बूंद से घड़ा भरता है और खाली भी होता है या फ़िर पानी की एक-एक बूंद कीमती होता है जैसे अनगिनत स्लोगन हम सभी पढ़ते, लिखते, देखते या सुनते होंगे। फ़िर भी क्या हमलोग अपने घर-हॉस्टल-कॉलेज-ऑफ़िस में लगे आरओ फ़िल्टर से बेहिसाब बहते पानी को देख कर क्या अनदेखा नहीं कर रहे होते हैं ? एक अनुमान के मुताबिक एक लीटर पानी साफ करने के लिए आरओ फ़िल्टर तकरीबन 3-4 लीटर पानी बर्बाद करता है। कहने का मतलब यह है कि एक लीटर पानी के लिए हमलोग अमूमन 3 से 4 लीटर पानी को बिना किसी इस्तेमाल के बहा दिया जाता है। वैसे आरओ फ़िल्टर को हमलोग बस उतना ही जानते हैं जितना आँख से देख रहे होते हैं। आइए आरओ फ़िल्टर का थोड़ा-बहुत अतीत जानते हैं।


जल संकट में वाटर प्यूरीफायर मशीन की भूमिका 

आरओ मशीन का पहली बार इस्तेमाल सन् 1949 में फ्लोरिडा में किया गया था। इस मशीन का असल मकसद खारे पानी वाले समुद्र से पीने लायक पानी निकालना था। लेकिन इसका इस्तेमाल वहां भी किया जाने लगा जहां पर पानी का खारापन उतना अधिक नहीं था जितना समुद्र का होता है। इसके दो नुक़सान हुए। पहला तो पानी की बहुत अधिक बर्बादी और दूसरा पानी में मौजूद जरूरी लवणता और खनिज पदार्थ भी आरओ से बाहर होने लगे। यानी शरीर को वह पोषक तत्व भी मिलने कम हो गए, जिनकी जरूरत थी। साल 2015 में तो यह स्थिति और अधिक खराब हो गई। ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैण्डर्ड के मुताबिक जितना पानी वाटर प्यूरीफायर मशीन में डाला जाता था, उसका केवल 20 फीसदी पानी ही साफ होकर बाहर आता था। यानी तकरीबन 80 फीसदी पानी बर्बाद हो जाता था। इतनी बड़ी बर्बादी को रोकने के लिए दिल्ली स्थिति  'गैर लाभकारी संगठन' ने याचिका दायर की। इस याचिका पर 29 मई, 2019 को सुनवाई करने के बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने यह फैसला लिया कि आरओ बनाने वाली कम्पनियाँ वैसी डिजाइन वाली मशीनें नहीं बनाएंगी, जिसमें पानी डालने पर 40 फीसदी से अधिक पानी बर्बाद हो जाए। यानी कम से कम तकरीबन 60 फीसदी पानी को साफ़ करना जरूरी है। और यह भी फैसला दिया कि पानी साफ़ करने के स्तर को बढ़ाकर 75 फीसदी तक ले जाने वाली मशीनें बननी चाहिए। इसके साथ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का यह भी फैसला है कि जहां के पानी में 500 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम ठोस पदार्थ हैं ( TDS यानी पानी में घुले सूक्ष्म पदार्थ ), वहां के पानी को साफ करने के लिए आरओ का इस्तेमाल करना जरूरी नहीं। NGT का कहना है कि पानी में प्रति लीटर 500 एमजी तक होने पर आरओ काम नहीं करता उलटे वह उसमें मौजूद कई महत्वपूर्ण खनिजों को हटा देता है जिससे पानी से मिलने वाले खनिज पदार्थ नहीं मिल पाते।

TDS क्या होता है, इसकी समझ हमें होनी चाहिए। यह शब्द उतना ही प्रचलित हो गया है जितना कि आरओ फ़िल्टर। TDS यानी पानी में घुले सूक्ष्म पदार्थ। इनमें सोडियम, फ्लोराइड, आयरन, क्लोराइड, कैल्शियम, मैग्निशियम, नाइट्रेट जैसे पदार्थ होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अध्ययन के मुताबिक प्रति लीटर पानी में  300 एमजी से नीचे TDS बेहतरीन माना जाता है, जबकि 800 से 900 एमजी खराब और इससे ज्यादा होने पर पानी को पीने योग्य नहीं माना जाता है । TDS बढ़ने का मुख्य कारण तेजी से घटता जल स्तर है। इसके अलावा जमीन के अंदर पानी के बीच जो पत्थर या मिट्टी है, अगर वह क्षारीय हैं, तब भी पानी में टीडीएस तेजी से बढ़ता हैं। 

रोटी, कपड़ा और मकान को जीवन की मूलभूत आवश्यकता माना गया है। अगर बात जीवन की अति मूलभूत आवश्यकताओं की किया जाए तो वह क्या हो सकता है ? निसन्देह, जल और वायु ! रोटी-कपड़ा-मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को ही जैसे-तैसे अपने जीवट संघर्ष से देश की मिश्रित आधी आबादी जुटा पाती है। वहीं अब शुद्ध जल-वायु जैसे अति मूलभूत आवश्यकता भी उनकी पहुँच से दूर होते जा रहे हैं, जो एक भयावह स्थिति के आगमन का संकेत है। इस हकीकत को हम सब कहानी के रुप सुनते आयें हैं कि राजस्थान सहित देश के अनेक जगहों पर महिलाओं का दिन कोसों दूर से पैदल पानी लाने में ही निकल जाता है। अपने जीवन के इस कहानी को हकीकत में बदल जाने से पहले ही हमें और हमारी सरकार को कुम्भकर्णी निंद्रा से जगना होगा है। श्रेष्ठ तो यह है कि समाज-शासन-प्रशासन-देश को कोसों पैदलगामी उन महिलाओं के लिए अभी ही जग जाना चाहिए जिनका जीवन पानी ढोने में ही निकल जाता है। उनकी जिन्दगी को करीब से देख-जानकर और उसमें सकारात्मक परिवर्तन लाकर हम सिर्फ़ उनका भला नहीं करेंगे बल्कि खुद को भी उस मुसीबत में घिरने से बचा पाएंगे।

स्वतंत्रता प्राप्ति के दौरान, भारत में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 5177 घनमीटर तथा वर्ष 2001 में 1820 घनमीटर थी। नवीनतम आकलनों के अनुसार वर्तमान में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1486 घनमीटर है जो वर्ष 2050 तक घटकर प्रतिव्यक्ति 1140 घनमीटर रह जाएगी। जल का नवीकरणीय स्वरुप होने के बावजूद वर्ष दर वर्ष प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता का अवरोही क्रम चिंतित करता है। हालाँकि पृथ्वी के दो तिहाई भाग पर जल है, लेकिन वर्तमान समय में पीने योग्य जल, चाहे वह भूजल हो या सतही जल, की कमी हमें भविष्य में होने वाली इस स्थिति के प्रति जागरूक कर रहा है -

       "Water, water, everywhere,
        Not any drop to drink"

(Lines from “The Rime of the Ancient Mariner,” by Samuel Taylor Coleridge.)

जल ही जल, फ़िर भी जल ही के लिए मार ! कहा जाता है कि अगर तीसरा विश्वयुद्ध कभी होगा तो वह जल के लिए ही होगा। भारतीय मानक ब्यूरो ने वर्ष 2018 में प्रकाशित नीति आयोग की रिपोर्ट के हवाले से बताया कि लगभग 600 मिलियन लोग गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। इसलिये स्वच्छ जल की गुणवत्ता मानवीय अस्तित्व के लिये बहुत आवश्यक है। आखिर पीने योग्य जल की कमी का मुख्य कारण क्या है और इस कमी को दूर करने का उपाय क्या हो सकता है ? कारण भी और समाधान भी दोनों हम ( मानव ) ही हैं। अपनी जीवन शैली में आमूल-चूल परिवर्तन लाकर हम जल की शुद्धता और उपलब्धता के साथ-साथ खुद के जीवन को भी बेहतर कर सकते हैं। यह आमूल-चूल परिवर्तन क्या हो सकता है, यह आपको खुद समझना होगा। यह समझ ही पहला कदम होगा वर्तमान और भविष्य में जल की उपलब्धता और शुद्धता को बनाये रखने के लिए। आप जल को स्वच्छ एवं संरक्षित रखने के लिए क्या कर रहें या क्या करने वाले हैं ?