By Malay Nirav

 यह कहानी कभी की नहीं है, न आज की, न बीते हुए कल की और न ही आने वाले कल की। यह कहानी न धरती की है, न अन्तरिक्ष की और न ही पाताल की। कहानी क्षणभंगुर है। हर शब्द लिखते ही मिटता भी जा रहा है। जब कहानी पढ़ा जा रहा होगा तब उसकी अहमियत शून्य होगी। यह कहानी न ही काल्पनिक है, न ही यथार्थपरक। इसका संबंध किसी जीवित या मृत पशु-पक्षी-पौधा से भी नहीं है और न ही इन्सान से। इस कहानी में न ही इंसानियत को दिखाया गया है न ही हैवानियत को। यह कहानी न ही सापेक्ष है न ही निरपेक्ष। यह कहानी, कहानी नहीं है बल्कि कहानी का राख है।

Representational Image of a King
Representational Image | The Donkey King (2018)

एक राजा था जो हज़ारों वर्ष तक राज करने का सिर्फ़ सपना ही नहीं देखता था बल्कि अपने सपने के बारे में नागरिकों को भी खुलकर बताता था, क्योंकि वह उच्च दर्जे का लोकतांत्रिक था। उसके राज में स्कूल-अस्पताल की भरमार थी। कमी थी तो बस मन्दिर-मस्जिद-श्मशान-कब्रिस्तान की। लेकिन राजा और उसका प्रजा दोनों आशान्वित थे कि यह कमी भी निकट भविष्य में दूर हो जाएगा। राजा-प्रजा दोनों का वक्त बेहतरीन बीत रहा था। राजा विकेंद्रीकृत सत्ता में यकीन रखता था। हर काम प्रजा से ही पूछ कर करता था। उसकी नज़र में हर प्रजा ही राजा था। वह प्रजा से पूछता था कि कितना धन चाहिए विकास के लिए, 100 लाख करोड़, 1,000 लाख करोड़ या 10,000 लाख करोड़। प्रजा अपने राजा को मानव नहीं महामानव और ईश्वर का अवतार मानती थी। इसलिए प्रजा राजा से कुछ भी मांगना अपने ईश्वर का अपमान समझती थी। प्रजा को पता था कि राजा अंतर्यामी है इसलिए सब कुछ बिन मांगे ही मिल जाएगा। प्रजा तो हतप्रभ रहती थी कि जो सपना देखकर वह भूल जाया करती था, राजा उस सपने को भी पूरा कर देता था।

राजा के राज में न गरीबी थी न बेरोजगारी। हर प्रजा खुद को राजा का सेवक मानती थी इसलिए उसे कभी रोजगार की जरूरत महसूस नहीं हुई। राजा खुद को प्रजा की सन्तान मानता था, इसलिए बे-रोक-टोक हक से उसकी सम्पत्ति को पुण्यार्थ दान कर देता था। प्रजा बेटा-रुपी पुरुषार्थी राजा को पाकर अपना जीवन धन्य मानती थी। राजा का रुतबा सिर्फ़ अपने राजक्षेत्र तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वह पूरे जग में प्रसिद्ध था। उसका कोई दुश्मन नहीं था। पड़ोसी राज भी उसके कृपा-पात्र थे। राजा कभी-कभी पुण्यार्थ पड़ोसी की जमीन को भी प्रेमपूर्वक हथिया लेता था।

सब चंगा और अच्छा-सा चल रहा था। राजा खुश था, इसलिए प्रजा भी खुश थी। लेकिन अचानक एक दिन जलजला आ गया। चारों तरफ़ जल-ही-जल था। प्रजा बेचैन होने का ढोंग कर रही थी। क्योंकि वह जानती थी कि अन्त तो सबका होता ही है। वह राजा की तरह अमर थोड़े है। और उस प्रजा का सौभाग्य होता है जो प्रतापी राजा के रहते हुए चैन से मरती है। सब तरफ़ शान्ति थी, कब्रिस्तान की शान्ति, श्मशान की शान्ति। राजा को बहुत दिन से जल-विहार करने का दिल हो रहा था। जल-ही-जल देख, वह अपना नया-नया 10 हज़ार वाला जहाज लेकर घूमने निकल गया। घूमते हुए उसे अद्भुत दृश्य दिखा। वह देखा कि उसका और उसके प्रजा का सपना पूरा हो रहा है। चारों तरफ़ श्मशान और कब्रिस्तान था। वह बेहद प्रसन्न हुआ और चिल्ला-चिल्ला कर अपने प्रजा को यह खुशखबरी बांचने लगा। डूबती-बहती प्रजा राजा के सामने नतमस्तक हो उठी। चारों ओर राजा की जय-जयकार होने लगी। बहती हुई प्रजा राजा को अपना आखिरी सलाम भेज रही थी।