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IMPRACTICAL MEDIA

ना...ना...ना...सुनना-पढ़ना-सुनाना

प्रतीकात्मक फोटो
By Malay Nirav 

यूट्यूब की दुनिया ब्रह्मांड जैसी लगती है, अनंत...अंतहीन...हाथ डालो अंदर और कुछ न कुछ जरूर निकल आएगा। स्क्रोल करते जाओ, करते जाओ, आकाश को देखते जाओ...देखते जाओ, आकाश नहीं खत्म होता, हमारा देखना ठहर जाता है, यूट्यूब हमारा आकाश ही तो है। इसी से आज निकला राज कॉमिक्स। ध्रुव, डोगा, नागराज, कोबी, भेड़िया, परमाणु, भोकाल... ये नाम हमारी दुनिया के किस्से, हमारे अपने हिस्से थे। हमारी उम्र दहाई में पहुँचने वाले थे कि ये हीरो हमारे जीवन में अवतरित हुए।

गाँव छोड़ शहर आया था। कुछ दोस्त, कुछ रिश्ते पीछे छुट आए थे। उस छूटे हिस्से में कौन आए, कौन उस खालीपन को भरे, हम भटकने लगे थे नए शहर की गालियों में। तब यूट्यूब नहीं था हमारे पास। सड़कों पर घूमना, नया-नया रास्ता तलाशना, दोस्त बनाना यह सब शुरू हुआ था। अरे...एक सेकंड...यह क्या...आज हमारे पास यूट्यूब है, अनलिमिटेड डाटा है, लेकिन महानगर छोड़ जब इस शहर में आया था तब भी मैं यही कर रहा था जो दो दशक पहले गाँव से शहर आने के बाद कर रहा था...सड़कों पर घूमना, नए-नए रास्ते तलाशना, दोस्त बनाना। मैं वही था, वही हूँ, लेकिन तब का भटकन कुछ और लेकर आया था, आज का कुछ और..!

दो दशक पहले, नए दोस्त बनने शुरू हुए, नए स्कूल में प्रवेश मिला, नए-नए खेल खेलने को मिलने लगे, नई कहानियों का आगमन हुआ। गाँव में, अपने छुटपन में, पहले मम्मी से कहानी सुनता था। सुनने का सुख...अद्भुत। ईश्वर ने कान दिया और हम उसका यह खूबसूरत इस्तेमाल कर रहे थे। नींद आ रही है, लेकिन मजाल है कि हमें वह सुला ले। जब तक मम्मी से कहानी नहीं सुनता था तब तक सोता नहीं था। कहानी सुनने का चस्का, कहानी को पढ़ने में धीरे-धीरे बदलने लगा था। पापा आते थे, चम्पक, नंदन लाते थे। पढ़ना सीख गया था। जैसे ही ये पत्रिकाएं घर पहुँचती हम पढ़ जाते थे। नंदन आता रहा, हम बढ़ते रहे। छुटपन से बाहर आने लगे थे कि शहर आ पहुँचे। नंदन का साथ भी गाँव के साथ ही पीछे छुट गया। शहर में नए दोस्त मिले, नए स्कूल भी लेकिन नंदन जैसा दोस्त नहीं।

अजनबी शहर और उसमें भटकना जारी था। एक दिन एक दोस्त के हाथ में रंगीन किताब दिखी। तस्वीरों से भरी। मजे से वह पढ़ रहा था। क्रिकेट खेलने का समय था, और वह है कि इंतजार...इंतजार करवाए जा रहा था। क्रिकेट-प्रेमी वह लड़का आज किसका दीवाना हो बैठा है, लेटा है। किताब उसके बैठने, सोने के ढंग के साथ अपने स्वरूप को बदलते जा रही है। उसका यूँ हर तरह से पढ़ना मुझे उस किताब को इधर, उधर, सब तरफ से दिखा गया था। चिढ़ हो रही थी कि समय भागा जा रहा, शाम हो जाएगी, क्रिकेट खेलना रुक जाएगा, लेकिन एक जिज्ञासा भी बॉल की तरह उछाल मार रही थी मेरे अन्दर। मैं भी पूछने लगा था उस किताब के बारे में। वह हू...हाँ...हू...हाँ के बीच में एक दो शब्द या अधूरी पंक्ति कह पढ़ने लगता था। इन अधूरे वाक्यों से होते हुए मुझे उस किताब का संक्षिप्त परिचय मिल चुका था। सुपर हीरो की किताब...वो स्टेट बैंक के पीछे कटरा वाली दुकान...खरीदी हुई नहीं...भारे पर लायी हुई किताब...1-2 रुपया में 2..3 दिन रख सकते हैं..कॉमिक्स... डोगा और उसका चेहरा...ये सब बातें मुझे भी इसकी तलाश में उस दुकान तक ले ही आयी थी।

शहर से पहले एक सुनहरा रिश्ता इस दुकान से हमारा बन गया था। यह दुकान ही हम तक शहर ला रहा था। स्कूल की छुट्टी के बाद हो या शाम में घर के लिए सब्जी लाना हो हर समय कहीं न कहीं यह दुकान अपनी जगह तलाश लेता था। कॉमिक्स पढ़ने का चस्का लग चुका था। सम्भवतः दीमक और मुझमें स्पर्धा हो कि कौन पहले सारी किताबों को चट कर सकता है। दिन हो या रात हर समय उसका ख्याल जेहन में बना रहता था।

हम, कॉमिक्स और दुकान मिल एक अलग दुनिया बनाने लगे थे। लेकिन इस दुनिया के बाहर की दुनिया जो ज्यादा ताकतवर थी, अक्सर हमारी दुनिया में दखल देने लगी थी। हमारा हीरो कॉमिक्स से बाहर नहीं आ सकता था न ही हम कॉमिक्स में जा सकते थे। लेकिन मम्मी...क्या कहने...उनकी आवाजाही दोनों ही दुनिया में समान गति से थी। वो आतीं तो कभी हमें सुना जाती कि बरखुदार परीक्षा सिर पर है और जनाब लगे हैं कॉमिक्स में। यह सुनाना हम तक ही नहीं ठहरता था, हमारे सुपर हीरो भी इसकी चपेट में आ जाते थे। "बैट-बॉल क्या कम था जो इन सबको उठा लाए। और ऐसा उठा लाए कि क्रिकेट खेलना भी भूल गए। देखो तो खुद को, यह सब पढ़ते-पढ़ते तुम्हारा चेहरा भी डोगा जैसा होने लगा है। कम करो यह बेगारी नहीं तो कुछ दिन में भेड़िया..कोबी दिखने लगोगे।" मैं  सोचता था कि कभी मम्मी ध्रुव का भी नाम ले लिया करें। मेरा पसन्दीदा सुपर हीरो। हम कॉमिक्स पढ़ते थे मम्मी हमारा मन...ऐसा कैसे हो जाए कि वे हमें हमारे फेवरेट हीरो जैसा कह दें। माएँ मनोविज्ञान की भी जननी हैं..!

सिर्फ बैट-बॉल  ही नहीं, फिल्म भी कॉमिक्स के बाद ही आने लगा था। हुआ कुछ यूं, घर के सब बड़े, बच्चे फिल्म देखने जाने वाले थे। सिनेमाघर। सब मतलब सब। कोई हमसे पूछा भी नहीं  कि तुम जाओगे या नहीं। सब तैयार हो रहे थे। मेरे मन में कुछ और पक रहा था। तानों और किताबों के बीच छिपा-छिपा कर कॉमिक्स पढ़ते हुए थक चुका था। यह स्वर्णिम तीन घंटा...सिर्फ़ मैं और कॉमिक्स होंगे। कैसे छोड़ सकता था यह साथ। काम आया अपना छोटा भाई। कुछ लाड़, कुछ दुलार और वह मान गया। उसके बाद मैंने अपना 'फिल्म देखने नहीं जाना' की घोषणा किया। सब शॉक्ड। क्या हुआ, सभी के मुखरे पर था। मैं थोड़ा उदास-चेहरा से बोला था, ब्रह्मास्त्र चलाया था, हर बार यही चलाता था, चल भी जाता था, तबियत कुछ ठीक नहीं है। इससे पहले सब फिक्रमंद होते नन्हा बोल उठा, हल्का पेट दर्द है, गर्म पानी पी लिए हैं, ठीक हो जाएगा। हम सब चलते हैं, इनको आराम करने देते हैं। हमारा प्लान सफल हुआ। नन्हा को यह लालच भी दिए थे कि कुछ नया अंक आया है, अगर आज नहीं गए तो हमारे हाथ कब आएगा पता नहीं। वह भी दीवाना था, इसलिए समझाने में ज्यादा वक़्त

 नहीं लगा था। सब फिल्म देखने चले गए, मैं भागा-भागा दुकान गया और उठा लाया था 2..4 कॉमिक्स और बेहद इत्मीनान से पढ़ना शुरू किया, कोई रोक-टोक नहीं...कोई भय नहीं...मैं और मेरा कॉमिक्स...पढ़े जा रहा था...जैसे आज स्क्रोल करता चला जाता हूँ, तब फटाफट पन्ना पलटता चला जा रहा था !