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By Sandhya Roy
रात की ख़ामोशी में आँखें बंद करते ही कुछ दृश्य भीतर उतर आते हैं। कहीं कहीं बाढ़ का उफनता पानी घर, खेत, सपनों की दीवारें सभी को अपनी लहरों में समेटता हुआ नज़र आता है। यह दृश्य सिर्फ़ पानी का नहीं, बल्कि हमारे समय का है, जो हर साल किसी न किसी गाँव की धड़कनों को डूबो देता है। फिर अचानक धरती सूख जाती है। दरारों से भरी ज़मीन का चेहरा जैसे समाज की फटी हुई रगे हों। यह सिर्फ़ सूखा नहीं, यह हमारी योजनाओं का सूखा है, हमारी प्राथमिकताओं का सूखापन है।
दृश्य बदलता है और शोर उमड़ता है-राजनैतिक रैलियों का शोर। नारों की गूंज, झंडों की लहर, मंचों की चकाचौंध। इन नारों के पीछे थका हुआ भीड़ का चेहरा है… जैसे किसी ने उम्मीद और यथार्थ के बीच अदृश्य दीवार खड़ी कर दी हो। इसी शोरगुल के बीच एक और चमक उठती है- दुर्गा पूजा पंडाल! रौशनी, सजावट और करोड़ों की लागत से खड़ा भव्य मंडप। देवी की मूर्ति दमक रही है लेकिन उसी रोशनी में कहीं गाँव के बुझे चूल्हे की परछाइयाँ भी झिलमिला जाती हैं। आस्था और उत्सव में कोई दोष नहीं पर जब आस्था आडंबर में बदल जाए तो मन सवाल करता है,"क्या यही रोशनी किसी भूखे बच्चे की आँखों में नहीं जग सकती थी"
और फिर एक वीडियो, दूर कहीं अमेरीका का। विशाल सरकारी लाइब्रेरी, जनता के लिए खुला हुआ ज्ञान का दरबार। हर हाथ के लिए सुलभ, लाखों–करोड़ों किताबें... यह दृश्य जैसे दर्पण हो। जो दिखाता है कि किसी समाज की असली चकाचौंध किताबों से आती है, पंडालों से नहीं।
ये सारे दृश्य एक-दूसरे से अनजान होकर भी एक ही प्रश्न करते हैं। प्रश्न यह कि हमारी प्राथमिकताएं कहाँ खो गईं? बाढ़ और सूखे के बीच भी रैलियाँ होती हैं। भूख और बेरोज़गारी की छाँव में भी करोड़ों के पंडाल खड़े किए जाते हैं और शिक्षा...ज्ञान...पुस्तकालय? वह अब भी किसी दूर देश की स्क्रीन पर ही चमकता है।
अगर हर पंडाल थोड़ा छोटा होता, हर रैली थोड़ी संयमित तो शायद किसी गाँव में किसी घर का चूल्हा बुझा न रहता। अगर हर नेता का भाषण थोड़ी देर किताबों के बीच गूंजता तो शायद लोकतंत्र की धड़कन और मज़बूत होती। इन दृश्यों की चमक और धुंध के बीच एक सीख है-"समाज वहीं खिलता है जहाँ आस्था के दीपक और ज्ञान की लौ साथ-साथ जले।
रात की खामोशी में ये दृश्य बार-बार कौंधते हैं। हर दृश्य दर्पण है हमारे समय, हमारी प्राथमिकताओं और हमारी संवेदनाओं का। नींद की उस नीरवता में जब ये दृश्य बार-बार कौंधते हैं, मन चुपचाप कहता है,"समाज की असली चमक केवल तब दिखेगी जब हमारी संवेदनाएँ जगेंगी, हमारी प्राथमिकताएँ बदलेंगी और जब हम उत्सव, राजनीति और आपदा के बीच संतुलन देख पाएँगे।"

