By Anees
"चर्चा, बहस और असंतोष एक खुले समाज की सबसे अच्छी चीजों में से एक है। दुर्भाग्य से आज के भारत में सरकार से असहमति जताना और आलोचना को देशद्रोही कार्यों के रूप में देखा जाता है। भागवत का बयान भी उसी कड़ी का हिस्सा है।"
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| Courtesy: ANI |
राष्ट्रीय स्वयंसेवक
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मोहनदास गांधी के तीन बंदरों को एक नई परिभाषा दी है। उदहारण
के तौर पर “बुरा मत कहो” के मायने यही है कि किसी
के बारे में कोई घृणित बात ना करो। मोहन भागवत के लिए इसका मतलब शायद यही है कि भले
ही कुछ गलत हो रहा हो लेकिन इसके बारे में कुछ बात न करें और चीजें अपने आप बेहतर हो
जाएंगी।
भागवत ने मंगलवार को
अपने विजयदशमी भाषण में कहा कि लिंचिंग भारतीय लोकाचार का शब्द नहीं है, उन्होंने कहा
कि “ 'लिंचिंग' शब्द की उत्पत्ति भारतीय लोकाचार से नहीं हुई। ऐसे शब्द को भारतीयों
पर ना थोपा जाए”। हालांकि भागवत ने यह
भी जोर देकर कहा कि भारतीयों को सद्भाव की दिशा में काम करना चाहिए और (हंसकर) दावा
किया कि आरएसएस के लोग भीड़ की हिंसा में शामिल नहीं थे। उन्होंने सुझाव दिया कि यह
शब्द बाइबल से आया है और भारत में इसका उपयोग नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह देश
को एक बुरा नाम देता है। भागवत के अहिंसा के
प्रति सेवाभाव के बावजूद उनकी असली चिंता लिंचिंग शब्द के इस्तेमाल में थी जिसमें अक्सर
हिंदुत्व कार्यकर्ता ही भीड़ का हिस्सा थे। सीधा मतलब इससे यही निकाला जा सकता है कि
अगर हत्याएं हो रही हैं तो उनके बारे में दुनिया को मत बताओ।
आरएसएस प्रमुख ने धीमी
अर्थव्यवस्था को लेकर भी ऐसा ही कुछ बयान दिया। उनका कहना है कि इसके बारे में भी बात
नहीं होनी चाहिए। भागवत ने कहा कि एक
अर्थशास्त्री ने मुझे बताया कि मंदी तब होती है जब आप शून्य से भी नीचे की वृद्धि दर
तक पहुंच जाते हैं लेकिन हमारे पास लगभग 5% की विकास दर है। इस पर चर्चा करने की आवश्यकता
नहीं है। इस पर चर्चा से एक माहौल का निर्माण होता है जो लोगों के व्यवहार को प्रभावित
करता है।
यहां पर भी मोहन भागवत
वास्तविकता से इत्तेफाक नहीं रखते। उनके हिसाब से भारतीयों को बस सरकार पर भरोसा करना
चाहिए जो पांच साल से अधिक समय से सत्ता में है और वर्तमान आर्थिक संकट के लिए पूरी
तरह से जिम्मेदार है।
भागवत का दृष्टिकोण
उस व्यवस्था से आता है जिसमें बुजुर्ग सभी बातों का ध्यान रखेंगे और बाकी सभी को बिना
कोई सवाल उठाए या यहां तक कि चीजों की स्थिति पर चर्चा किए बिना जीवन बिताना चाहिए।
यह विचार लोकतंत्र के साथ मेल नहीं खाता। चर्चा, बहस और असंतोष
एक खुले समाज की सबसे अच्छी चीजों में से एक है। दुर्भाग्य से आज के भारत में सरकार से असहमति जताना और आलोचना को देशद्रोही कार्यों
के रूप में देखा जाता है। भागवत का बयान भी उसी कड़ी का हिस्सा है।

