29 अक्टूबर से दिल्ली की बस सेवाएं महिलाओं के लिए निशुल्क कर दी जाएँगी। मेट्रो सेवाएं भी निशुल्क करने का प्रस्ताव केंद्र सर्कार को भेजा जा चुका है लेकिन विडम्बना देखिये की जिस लोकसभा को इस प्रस्ताव पर मंजूरी देनी है उसमे ही महिलाओं की भागीदारी 14 प्रतिशत तक सिमट कर रह गयी है। जहाँ हम एक ओर समाज में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने में लगे हैं वहीँ दूसरी ओर 'प्रशाशन' में उनकी ना के बराबर हिस्सेदारी को अनदेखा कर रहे हैं। तभी तो महिला आरक्षण बिल भारतीय राजनीति में गले का फांस बना हुआ है। जो इनसे न तो उगलते बन रहा है और न निगलते ही बन रहा यही। पिछले 10 से अधिक सालों से शायद ही कोई संसद सत्र होगा जिसमें महिला आरक्षण बिल की बात न उठी हो।
सवाल ये उठता है की ये आरक्षण आवश्यक क्यों है? इसका एक उत्तर यह है कि ऐसे लोकतंत्र में जहाँ वोटरों के रूप में उनका अनुपात लगभग समान है, वहाँ उनके प्रतिनिधित्व का भी अनुपात बराबर होना चाहिए। हमारे देश में महिलाओं से जुडी कई समस्याएँ है जिनका हल निकालना अभी बाकी है ऐसे में उनकी आवाज़ बनने के लिए लोकसभा में महिलाओं का एक मजबूत प्रतिनिधित्व अनिवार्य हो जाता है। जब ये बातें सत्तापक्ष के सामने रखी जाती है तो वो अक्सर ये कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि लोकसभा में महिला सांसदों कि संख्या धीरे-धीरे ही सही लेकिन बढ़ तो रही है।
१९५२ कि लोकसभा में महिला सांसदों कि हिस्सेदारी 5 प्रतिशत थी जो 17वीं लोकसभा आते-आते 14% तक पहुँच गयी है। 67 सालों में 9% कि ये बढ़ोतरी उनके लिए शायद उपलब्धि हो लेकिन अधूरा सच हमेशा ही हानिकारक होता है। ये गौरकरने कि बात है कि 1952 के लोकसभा चुनाव में 43 महिलाओं ने चुनाव लड़ा था और उनमें से 22 महिलाएँ सांसद बनीं थी। अतः पहले लोकसभा में 50% से ज्यादा महिलाएँ जीतीं थी वहीँ 17वीं लोकसभा कि बात कि जाये तो ये लगभग 11% तक ही सिमट कर रह गयी है।
543 सीटों पर चुनाव होने वाली लोकसभा में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करने वाले इस बिल को सर्वप्रथम लोकसभा में 1996 में पेश किया गया था और तब से लेकर अब तक इसके पक्ष में एक राय नहीं बन सकी है। ये बात समझ से परे कि 1993 के 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधन के बाद भी इस बिल को लोकसभा में हमेशा विरोध का सामना करना पड़ता है जबकि इस बिल को राज्यसभा ने मार्च 2010 में ही पारित कर दिया था। राज्यसभा स्थायी सदन है इसीलिए ये बिल अभी तक ज़िंदा है। हाँ, 1996 से अब तक ये बिल कई पार्टियों के चुनावी एजेंडे का हिस्सा बन चुका है। भाजपा के चुनावपत्र में इस बिल का ज़िक्र तो हमेशा से ही होता आया है चाहे वह 2014 का चुनाव हो या 2019 का लेकिन शायद कश्मीर और राम मंदिर को उन्होंने इतनी प्राथमिकता दे दी कि बाकी चुनावी मुद्दों कि तरफ उनका ध्यान ही नहीं गया। इस बिल का विरोध करने वाली पार्टियों में राजद, बसपा, जदयू प्रमुख रहीं हैं और इन्होनें इसके विरोध में कई दलीलें दी हैं। इन पार्टियों का मानना है कि चुनाव में उचित अवसर नहीं मिल पाएंगे दूसरी दलील यह हहि कि जहाँ लोकसभा में 543 में से 131 सीटें पहले से ही आरक्षित हैं वहाँ ये नया आरक्षण सामान्य श्रेणी के पुरूषों के लिए न्यायसंगत नहीं होगा।
फिर भी सरकार का यह कर्त्तव्य है कि वह कम-से-कम इस बिल को लोकसभा में पेश करे। एक तरफ तीन तलाक़ बिल को लेकर उनकी संजीदगी और दूसरी तरफ इस बिल को लेकर उनका उदासीन रवैया उनके दोहरेपन का सूचक है। मनमोहन सरकार के पास तो 2010 में बहुमत कि समस्या थी, लेकिन मोदी सरकार तो सिर्फ अपने सांसदों के दम पर इस बिल को पारित करवा सकती है। हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ये नया प्रतिनिधित्व समाज के हर तबके, हर क्षेत्र से हो ताकि किसी भी मुद्दे पर समाज के प्रत्येक वर्ग के दृष्टिकोण से चर्चा हो नहीं तो ये संशोधन भविष्य के लिए एक बुरा उदाहरण मात्र बन कर रह जाएगा।

