By Prabhakar
"सरकारों में थोड़ी भी गैरत हो तो रामराज्य की प्रजा और अपने देशवासियों की स्थिति की तुलना जरूर करनी चाहिए।"
आज भारतीय जनमानस का एक बहुत बड़ा हिस्सा खुशियों में सराबोर है।उत्सव मनाया जा रहा है।अयोध्या वासी ही नहीं बल्कि पूरे देश के लोग अपनी आस्था और विश्वास के प्रतीक राम को पुन: अयोध्या में स्थापित होता देख अत्यंत उत्साहित हैं।मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठित राम का जीवन भारतीय जन में एक आदर्श स्थान रखता है। हर भारतीय आस्था के प्रतीक पुरूष राम को सादर सप्रेम अपनाना चाहता है। व्यक्तिगत जीवन और आस्था का यह संगम अद्वितीय है। राम जनमानस के अधिक करीब हैं।
अयोध्या में विवादित स्थल पर मंदिर निर्माण को लेकर हाल ही में आये सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने देश की हिंदू मान्यता में पूज्यनीय राम को रामजन्म भूमि में स्थापित करने की अनुमति दे दी जिसके बाद से ही मंदिर निर्माण से जुड़े कार्यक्रम को चरणबद्ध तरीके से पूरा किया जा रहा है। बीते बुद्धवार को देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राम मंदिर की आधारशिला रखी और पूरे विधि विधान के साथ भूमि पूजन का कार्य भी सम्पन्न किया।
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| Courtesy: Creative Commons |
भावना,आस्था और विश्वास के भाव में डुबकी लगाने वाली निश्छल जनता भला छल - कपट को क्यों जगह और तरजीह देती ? व्यथित जीवन के क्षणों में एक चीथड़ा सुख ही काफी होता था। सरकारें राम राज्य को भले भूल गईं लेकिन राम को नहीं भूलीं। भले ही राम “राज्य” पर अधिकार या यूँ कहें एकाधिकार प्राप्त करने के साधन रूप में क्यों न हों। और दूसरी ओर भोली भाली मासूम जनता जिसके जीवन में उम्मीद ही किनारे का काम करता है वरना राम के नाम पर भला क्यों गरीबी, भुखमरी और उदासी के मौसम में अपने घरों पर उम्मीद के दीये जला रही होती । उम्मीद भी विश्वास की है-राम के राज्य की है। रामराज्य न सही जनता को राम के तो दर्शन होंगे।
सरकारों में थोड़ी भी गैरत हो तो रामराज्य की प्रजा और अपने देशवासियों की स्थिति की तुलना जरूर करनी चाहिए। देश का वर्तमान, रामराज्य के आदर्शों पर भले ही खरा न उतरे लेकिन सरकारें चाहें तो रामराज्य की ओर कदम जरूर बढ़ा सकती हैं। सरकार किसी भी विचार धारा की हो, सरकार में विभिन्न पदों पर आसीन लोग भले ही विभिन्न प्रकार के मतावलंबी हों लेकिन उनका मूल धर्म राज्य अथवा देश का विकास ही होना चाहिए। जब देश कोरोना वायरस जैसी बड़ी महामारी से जूझ रहा है और पूरा देश में बाढ़ और लंबे लॉकडाउन के बाद उपजी बड़ी बेरोजगारी जैसी तमाम आपदाओं से जूझ रहा है और आम जन जीवन कठिनाई में है ऐसे कष्ट में उत्सव की तैयारी करना राम के देश में बेमानी ही नहीं शर्मनाक भी हो जाता है।
वर्तमान समय में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। भारत में यह वैचारिक रूप से दक्षिण पंथी विचारधारा को साथ लेकर चलने वाली राजनैतिक पार्टी के रूप में जानी जाती है। दक्षिण पंथी यानी दक्षिण पंथ के समर्थक समाज की ऐतिहासिक भाषा और धार्मिक पहचान को बनाये रखने की इच्छा रखते हैं। लेकिन जब यह चेष्टा सबसे सर्वोपरि हो जाये तो सामाजिक सरोकार का मायने खत्म होने लगता है और पूरा का पूरा मसला व्यापरिक हो जाता है। अपनी जीत के लिए राजनीतिक पार्टियाँ जनता के साथ छल करती हैं। भोली भाली जनता का लोकतंत्र के उत्सव में शामिल होना मजबूरी हो जाता है। वह लोकतंत्र का उत्सव तो मनाती है लेकिन अपने वोट से देशहित के बड़े अनुष्ठान में अपने उम्मीदों की आहुति देकर। "विकास और वादों के झूठे दावे और बेबस जनता से ठगी" यही वह पंचवर्षीय योजना है जो हर पाँच साल बाद तैयार की जाती है।
आस्था के प्रतीक “राम” नाम में ही पूर्ण हैं। “राम” किसी शिला के दायरें में नहीं राम जन-जन के मन में हैं। यदि राम, रावण यानी बुरी नियत के लोगों के साथ रखे जायें तो आस्था और विश्वास के लोक में इससे बड़ा सितम क्या होगा ? राम के बारें असग़र मेहदी होश ने शायद इसीलिए लिखा है:
"क्या सितम करते हैं मिट्टी के खिलौने वाले,
राम को रक्खे हुए बैठे हैं रावण के क़रीब "

