By Malay Nirav

"आजकल PM-किसान सम्मान निधि के घोटाले सामने आ रहे हैं जो डीबीटी की खामियों को उजागर कर रहे हैं। उदाहरण स्वरुप हिमाचल प्रदेश में फर्जी तरीके से 11, 388 आयकर देने वालों ने भी किसान सम्मान निधि योजना का लाभ ले लिया।"


यह सर्वविदित है कि खुद के अनुभव से ज्यादा प्रमाणिक दस्तावेज और कोई नहीं होता है क्योंकि इसे प्राथमिक स्रोत माना जाता है। इस आलेख की शुरुआत भी मैं अपने जीवन के दो घटनाओं से करने जा रहा हूँ। हालाँकि यह अनुभव सिर्फ़ मेरा है और आप इससे इत्तेफाक रखें, यह जरुरी नहीं है। यहाँ यह भी स्पष्ट कर देता हूँ कि इन दोनों घटनाओं के समय और स्थान अलग-अलग हैं।

पहली घटना संभवतः 2012-13 की है। घटना बेगूसराय, बिहार की है। हम तीन लड़के एक ही बाइक पर फिल्म देखने जा रहे थे। उम्मीद से परे पुलिस वालों ने हमें पकड़ लिया। उन्होंने बाइक रख लिया, लेकिन इतनी सहूलियत दे दी कि हम फिल्म देखने के बाद चालान भर सकते हैं। फिल्म देखकर जब हम वापस आए तो हमारे बीच एक प्रेम भरा वार्तालाप शुरू हुआ। उन्होंने बताया कि अगर कानूनी रुप से चालान किया जाता है तो हमें लगभग 1000 रूपये देना पड़ेगा, लेकिन आप चाहेंगे तो केवल 800 रूपये में भी बात निपट सकती है। उनका इशारा रिश्वत की तरफ़ था। हालाँकि हम लोग उनसे आग्रह कर रहे थे कि सर यह हमारी पहली गलती है ( मतलब वह गलती जो पहली बार पकड़ी गयी थी ) इसलिए हिदायत देकर माफ़ कर दें। लेकिन उन्होंने इसे सिरे से खारिज कर दिया जो कि स्वाभाविक ही था। फ़िर हम लोग भी एक जिद पर अड़ गए, जो उनके लिए अप्रत्याशित था। हमारा कहना था कि हम चालान देंगे, लेकिन कानूनी तौर पर और बकायदा रसीद भी लेंगे। अब उनके तरफ़ से मान-मनौवल का दौर शुरू हुआ। उनके तरफ़ से रकम घटते-घटते 500 रूपये तक पहुँच चुका था। हमारा दिमाग भी डोलने लगा था लेकिन एक जिद भी कहीं अन्दर तक घुसपैठ कर बैठी थी कि शुरू में इन्होंने हमारी माफ़ी की विनती को कठोरतापूर्वक नकारा था तो अब हमारी बारी है। अन्ततः उनको चालान की रसीद देनी पड़ी।

दूसरी घटना सन 2019 की है। घटना-स्थल दिल्ली है। अपनी लापरवाही की वजह से ही मेरे रुम से 4000 रूपये की चोरी हो गयी थी। मुझे जिस लड़के पर शक था उससे मैं विनम्र और कठोर दोनों रुप से रुपए पेश आया। लेकिन उसने चोरी से साफ़ इंकार कर दिया। फ़िर मैं पुलिस कंट्रोल रूम 100 नम्बर पर कॉल कर पुलिस को बुला लिया। समय पर पुलिस आ गयी, फ़िर उन्होंने सामान्य ढंग से लड़के से पूछताछ की। लेकिन जब वह अपने जिद पर अड़ा रहा तो उन्होंने अपने तरीके से पूछताछ शुरू की। आखिरकार लड़का अपनी गलती को माना और रुपया वापस कर दिया। इस पूरे प्रक्रम में पुलिस का व्यवहार सौहार्दपूर्ण और शिष्ट था जो मुझे आश्चर्यचकित कर रहा था। साथ ही मैं इस बात को लेकर अत्यंत आह्लादित था कि पुलिस की तरफ़ से रिश्वत को लेकर कोई इशारा नहीं किया गया था।

आप सोच रहें होंगे कि मैंने यह दो आत्म-कहानी क्यों सुनायी?  इन कहानियाँ में मुझे भ्रष्टाचार-मुक्त भारत की एक सुनहरी तस्वीर दिखती है। लेकिन यह तस्वीर आजकल थोड़ी धुंधली होती दिख रही है। इसका कारण है भ्रष्टाचार पर निगाह रखने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था “ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल” की रिपोर्ट! नवंबर, 2020 में आए इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब उनतालीस प्रतिशत लोगों को अपना काम कराने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। यह एशिया में रिश्वत की सबसे ऊंची दर है। यानि कि भारत घूसखोरी के मामले में एशिया में अव्वल है। अव्वल होना हमेशा श्रेष्ठ और उत्तम होने की गारंटी नहीं होती है ! बात यहीं नहीं रुकी, रिपोर्ट में मेरी कहानी के हीरो ही विलेन बनते दिख रहे हैं। सर्वे में सरकारी कर्मचारियों में पुलिसकर्मियों को सबसे ज्यादा भ्रष्ट पाया गया। छियालीस फीसद लोगों ने माना कि पुलिस सबसे ज्यादा भ्रष्ट हैं। इसके अलावा बयालीस प्रतिशत का मानना है कि सांसद भ्रष्ट हैं। आमतौर पर भारतीय नागरिक जज को बेदाग छवि का मानते हैं, लेकिन इस रिपोर्ट के अनुसार बीस प्रतिशत लोगों ने कहा कि जज और मजिस्ट्रेट भी भ्रष्ट हैं, जो कि मुझे अचंभित कर रहा है। साथ ही इस रिपोर्ट में भ्रष्टाचार के अनेक रुप भी बताए गए हैं। जैसे सरकारी भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, सिफारिशी भ्रष्टाचार, वोट के बदले नोट, काम निकलवाने के लिए होने वाला शारीरिक शोषण आदि। एशिया में सबसे ईमानदार देशों के बारे में बात करें तो मालदीव और जापान में सिर्फ़ दो प्रतिशत लोग मानते हैं कि उन्हें रिश्वत देनी पड़ी। तीसरे नम्बर पर दक्षिण कोरिया है।

भारत में भ्रष्टाचार के संदर्भ में अनेक राजनेताओं ने तीखी टिप्पणी की है। सबसे पहले जिनका जिक्र आता है वे हैं, डॉ. राममनोहर लोहिया। 21 दिसम्बर, 1963 को भारत में भ्रष्टाचार के खात्मे पर संसद में हुई बहस में उन्होंने कहा था कि सिंहासन और व्यापार के बीच संबंध भारत में जितना दूषित, भ्रष्ट और बेईमान हो गया है उतना दुनिया के इतिहास में कहीं नहीं हुआ है। राजीव गाँधी की भ्रष्टाचार के संबंध में आत्म-स्वीकृति एकबारगी झकझोर देती है। उन्होंने 1985 में ओडिशा में भ्रष्टाचार का जिक्र करते हुए कहा था कि सरकार के 1 रुपये में से सिर्फ़ 15 पैसे ही लोगों तक पहुंचते हैं। कमोबेश आज का सच भी इसी के आसपास है। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण या डीबीटी भारत सरकार का एक नया तंत्र है जिसके माध्यम से लोगों के बैंक खातों में सीधे धनराशि अंतरित की जाती है। भारत सरकार इसको भ्रष्टाचार के रोकथाम में रामबाण मानती है। इसके फायदे भी देखने को मिल रहे हैं, लेकिन इस पहल में भी छिद्र दिखने लगे हैं। आजकल PM-किसान सम्मान निधि के घोटाले सामने आ रहे हैं जो डीबीटी की खामियों को उजागर कर रहे हैं। उदाहरण स्वरुप हिमाचल प्रदेश में फर्जी तरीके से 11, 388 आयकर देने वालों ने भी किसान सम्मान निधि योजना का लाभ ले लिया।

भ्रष्टाचार देश के लिए कैंसर है। इसको स्टेज 4 तक पहुँचने से पहले ही हमें रोकना होगा नहीं तो यह लाइलाज हो जाएगा। यह एक तरह का मनोविकार भी है। समाज में इसकी पैठ गहरी होती जा रही है। इसे दूर करने के लिए परिवार और स्कूल को आगे आना होगा। परिवार में जिस तरह बड़ों का सम्मान करना सिखाया जाता है वैसे ही भ्रष्टाचार का अपमान करना भी सिखाया जाना चाहिए। शिशु का मन खाली स्लेट की तरह होता है। उस पर मनचाहा लिखा जा सकता है। अतः शुरुआती कक्षा में नैतिक शिक्षा को अनिवार्य कर देना चाहिए जिससे बालक प्रारंभ से ही भ्रष्टाचार जैसे विकारों से नफ़रत करने लगे। साथ ही कानून और उसका डर लोगों में बनाये रखने के लिए उसका क्रियान्वयन सम्बंधित संस्था द्वारा बेहतर ढंग से होना चाहिए। RTI जैसे कानून को लगातार बेहतर बनाने का प्रयास भी होते रहना चाहिए। शेष तो यही कह सकता हूँ कि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए स्व-नियमन से श्रेष्ठ कोई अन्य उपाय नहीं हो सकता है।