By Malay Nirav
राष्ट्रवाद नहीं, भ्रमवाद! वर्तमान समय में विश्व के अनेक देशों में दक्षिणपंथी राजनीति का उभार देखा जा रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञ इन्हें राष्ट्रवादी भावना का पोषक मानते हैं। हो सकता है, इनमें से कुछ सच में राष्ट्रवादी विचारधारा से इत्तेफ़ाक़ रखते हों लेकिन अधिकतर देशों में यह देखा जा रहा है कि तथाकथित राष्ट्रवादी दल जनता को भ्रमित कर रहे हैं। फेक खबरों के माध्यम से आम नागरिक की भावनाओं में उन्माद का तड़का लगा रहे हैं। मुझे ऐसे दलों को राष्ट्रवादी कहने में संकोच होता है। राष्ट्रवाद को रवींद्रनाथ ठाकुर मानवतावाद की तुलना में हेय मानते थे। वे भले ही कहा करते थे कि हीरे के दाम ( मानवतावाद ) में शीशा का ग्लास ( राष्ट्रवाद ) नहीं खरीदूंगा लेकिन वर्तमान समय के तथाकथित राष्ट्रवादी दल को देखते हैं तो ऐसा लगता है कि ठाकुर जी आज होते तो राष्ट्रवाद की तुलना प्लास्टिक का ग्लास से करते। हालांकि मुझे राष्ट्रवाद से सकारात्मक भावना की खुशबू आती है, मानवतावाद जैसी। जिसे रवींद्रनाथ ठाकुर राष्ट्रवाद कहकर हेय नज़र से देखा करते थे, उसे मैं राष्ट्रवाद नहीं मानता हूँ। वह राष्ट्रवाद को बदनाम करने वाली एक विकृत सोच मात्र है, जिसको राष्ट्रवाद का जामा पहनाकर राजनेता/शासक/तानाशाह नागरिक को भ्रमित करते हैं। मैं इसे "भ्रमवाद" कहता हूँ।
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| Photo Credit: The New Yorker |
राष्ट्रवाद सांप्रदायिक होना नहीं सिखाता है बल्कि यह सर्वधर्म समभाव होना सिखाता है। यह लोगों में श्रद्धा एवं विश्वास की भावना का विकास करता है न कि घृणा और विश्वासघात की भावना का। हालाँकि आजकल के तथाकथित राष्ट्रवादी ( भ्रमवादी ) खुद को ज्यादा से ज्यादा सांप्रदायिक-नस्लभेदी दिखाने में यकीन रखते हैं। समाज और राष्ट्र में घृणा फैलाना ही उनका स्वभाव होता है। राष्ट्रवाद की धुरी कभी भी अन्य देशों से नफ़रत पर नहीं टिकी होती है बल्कि यह खुद से, अपने देश से, मानव से, प्रकृति से प्रेम पर टिकी होती है।
सब कहा ही राष्ट्रवाद नहीं है बल्कि बहुत कुछ अनकहा भी राष्ट्रवाद है। यह नित्य नवीन और अद्यतित होता रहता है। यह सत्य, सनातन एवं शाश्वत है। जयकारा ही राष्ट्रवाद नहीं है बल्कि मौन भी राष्ट्रवाद है। यह व्यष्टि से समष्टि और समष्टि से व्यष्टि के बीच की यात्रा है। यह विस्थापन नहीं, पुनर्वास है। राष्ट्रवाद न सिर्फ़ आपको उत्साही बनाता है बल्कि सहिष्णु होना भी सिखाता है। भ्रमवाद मृगमरीचिका है तो वहीं राष्ट्रवाद हकीकत। शेष कुछ नहीं "मैं" का त्याग ही ‘राष्ट्रवाद’ है।

