By Malay Nirav
पुलिस हो या राजनेता, इनका स्त्री-फोबिया चेहरा सामने आता रहता है लेकिन आजकल इस फेहरिस्त में न्यायमूर्ति भी शामिल होने लगे हैं। आखिर क्यों? भारत देश में आज भी नागरिक न्यायालय पर औरों के बनिस्पत ज्यादा भरोसा करते हैं। उसी न्याय के मन्दिर से लैंगिक संवेदनशीलता को लेकर लचर नजरिया सामने आ रहा है।
![]() |
| Representational Image | Credit- I Draw Fashion |
उपरोक्त कथन अगर एक आम इन्सान द्वारा कहा गया होता तो हममें से अधिकतर उसकी सोच को सड़क छाप सोच मान रहे होते। हममें से ही कुछ लोग इस सोच पर ताली बजा सकते हैं और इस सोच को जायज भी मान सकते हैं। हालांकि उपरोक्त टिप्पणी और फैसले में से कुछ को सुप्रीम कोर्ट रद्द कर चुकी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से निकले "शादी का ऑफ़र" वाली टिप्पणी भी तक वापस नहीं ली गयी है।
मैं जातिगत एवं धर्मगत भेदभाव पर खुलकर अपनी सोच को सामने रख सकता हूँ, लेकिन जैसे ही बात स्त्री-विमर्श और स्त्री-पुरुष भेदभाव पर होती है तो एक झिझक सी होती है। ऐसा लगता है कि कहीं अन्दर एक चोर बैठा है। वजह शायद मर्दवादी मानसिकता हो सकती है या पितृसत्तात्मक विचार-प्रक्रिया या फ़िर मानसिक रुढ़िवाद ! हालांकि स्वच्छंद विचार की खुशबू के आगोश में आने से खुद को रोक भी नहीं पाता हूँ ! इसलिए यह द्वंद हमेशा बना रहता है कि लैंगिक भेद-भाव, समानता एवं संवेदनशीलता पर कुछ बोलूं-लिखूं या नहीं! इस समय भी एक प्रश्न बार-बार मेरे मन में कौंध रहा है कि क्या उपरोक्त कथन पर टिप्पणी करने के लिए मैं नैतिक रुप से सक्षम हूँ?
पितृसत्ता से तो आप भलीभांति परिचित होंगे, शायद मातृसत्ता शब्द से भी परिचित हों। मातृसत्ता आज भी उत्तर-पूर्व भारत के कुछ क्षेत्र एवं जनजाति ( मेघालय की गारो जनजाति, खासी और जैनतिया जनजाति ) में अस्तित्व में है। मैं पितृसत्ता एवं मातृसत्ता व्यवस्था दोनों को समतुल्य मानता हूँ। दोनों व्यवस्था में अनेक खूबियाँ और कमियाँ हैं। एक जगह महिला तो दूसरे जगह पुरुष अपने अधिकार के लिए संघर्षरत हैं। हालाँकि पितृसत्तात्मक व्यवस्था विस्तारवादी स्वरुप में है वहीं मातृसत्तात्मक व्यवस्था अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए जूझ रही हैं। हर एक व्यवस्था अपने को वजूद में बनाये रखने के लिए लोकतांत्रिक स्वरुप की अपेक्षा वर्चस्ववादी एवं तानाशाही रवैये को अपनाना पसंद करता है।
![]() |
| Delhi Congress women’s wing staged join a protest at Connaught Place on Friday over the ripped jeans controversy | Photo Credit- India Today |
पुलिस हो या राजनेता, इनका स्त्री-फोबिया चेहरा सामने आता रहता है लेकिन आजकल इस फेहरिस्त में न्यायमूर्ति भी शामिल होने लगे हैं। आखिर क्यों? भारत देश में आज भी नागरिक न्यायालय पर औरों के बनिस्पत ज्यादा भरोसा करते हैं। उसी न्याय के मंदिर से लैंगिक संवेदनशीलता को लेकर लचर नजरिया सामने आ रहा है। क्या यह खतरे की घंटी नहीं है? अगर न्याय के मंदिर से ऐसी टिप्पणी और फैसले आने लगेंगे तो आम नागरिक के पास क्या विकल्प हो सकते हैं ?
हमारा देश केवल कृषि प्रधान देश ही नहीं है बल्कि देवी-देवता प्रधान देश भी है। यहां शक्ति का स्रोत देवी को माना जाता है। लेकिन क्या वास्तविकता में भारतीय नारी शक्ति की स्रोत है? हम अक्सर देखते हैं कि एक महिला को शक्तिशाली-प्रभुत्वशाली दिखाने के लिए "मर्दानी " विशेषण का प्रयोग होता है। जिस तथाकथित पितृसत्तात्मक समाज में नारी की शक्ति को व्यक्त करने के लिए एक अदद शब्द की कमी हो वहां का समाज किसी नारी को क्या वास्तव में प्रभुत्वशाली होने देगा? क्या वह समाज सही मायने में लैंगिक भेदभाव को त्याग कर लैंगिक समानता की और अग्रसर हो पाएगा ? हमारे जज भी इसी समाज से निकल कर आते हैं। इसलिए उनमें भी कभी-कभार लैंगिक संवेदनशीलता की कमी देखने को मिल जाती है।
लैंगिक संवेदनशीलता मॉडयूल
अब सवाल उठता है कि जज सहित आम नागरिकों में लैंगिक समानता और संवेदनशीलता के प्रति जागरूकता कैसे लाया जाए? इस सवाल का आंशिक जवाब कुछ दिन पहले आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ही खोजा जा सकता है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के विवादित फैसले, 'जिसमें यौन उत्पीड़न के एक मामले में अभियुक्त को पीड़ित महिला से राखी बंधवाने की शर्त पर जमानत दी गयी थी', को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अहम टिप्पणीयाँ की और लैंगिक संवेदनशीलता के लिए दिशा-निर्देश भी जारी किया। शीर्ष अदालत ने फैसले की शुरुआत हेनरिक इब्सेन के उद्धरण से की, जिसमें कहा गया कि वर्तमान में महिलाएं ऐसे समाज में हैं जो विशेषकर मर्दाना है, जहां पुरुषों द्वारा बनाया गया कानून और न्यायिक व्यवस्था है, जिसमें महिलाओं का आचरण पुरुषवादी नजरिये से आंका जाता है। कोर्ट ने कहा कि इब्सेन ने यह बात उन्नीसवीं शताब्दी में कही थी और दुख की बात है कि आज 21वीं शताब्दी में भी यह सत्य है। कोर्ट ने कहा कि यह फैसला सिर्फ जमानत के एक आदेश के खिलाफ केस की मेरिट पर ही नहीं है, बल्कि न्यायिक आदेशों में दिखने वाली पुरुषवादी और महिला विरोधी आचरण के व्यापक परिप्रेक्ष्य में भी है। सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न अदालतों के जजों से महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों में स्टीरियोटाइप टिप्पणियों और लकीर का फकीर बने रहने वाली सोच से बचने को कहा है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक अकादमी को वकीलों, जजों और लोक अभियोजकों के लिए लैंगिक संवेदनशीलता मॉडयूल विकसित करना चाहिए। मेरी नजर में यह मॉडयूल हर सरकारी अधिकारी, पुलिस-प्रशासन से लेकर निजी क्षेत्र में काम करने वाले सभी कर्मचारियों के लिए भी अनिवार्य कर देना चाहिए। इसके साथ ही बाल्यावस्था से ही बालक-बालिका को लैंगिक समानता और संवेदनशीलता के प्रति जागरूक करना चाहिए।


