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Malay Nirav 


अगर इतिहास के आईने में झाँके तो भारतीय बाजार के कई रंग, रूप बिखरे मिलेंगे। हाट, मंडी, साप्ताहिक बाजार, दैनिक बाजार, रात्रि बाजार, लोकल बाजार, अब का शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, मॉल, ऑनलाइन बाजार। दिन, समय के आधार से लेकर सामानों के प्रकार के हिसाब से भी बाजार का अपना स्वरूप होता है। सर्राफा बाजार, फल मंडी, सब्जी मंडी, थान मार्केट, मछली बाजार, चोर बाजार, शेयर बाजार, सट्टा बाजार। मछली बाजार तो कभी-कभार हमारे क्लासरूम में भी आ जाता था। जब हम बच्चे बेहद शोर मचा रहे होते थे, भाषा, शब्द, भाव सब सुनने वालों की पकड़ से बाहर हो जाता था, तब अक्सर हमारे गुरु कह उठते थे कि कक्षा को तुम सबने ‘मछली बाजार’ बना रखा है।

1990 का दशक भारतीय बाजार के लिए नया दौर लेकर आया। उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण भारत को, उसकी अर्थव्यवस्था को नए परिदृश्य में ला खड़ा किया था। खुलता बाजार अपने लिए उपभोक्ता की तलाश में महानगर से शहर और शहर से गाँव की ओर निकला। उपभोक्ता की खोज ने उसे अनेक भाषाओं के क्षेत्र में आने पर मजबूर किया। पिछले दो-तीन दशक के विज्ञापनों की भाषा से हम यह देख सकते हैं कि उदारीकरण के बाद बाजार की भाषा के रूप में हिन्दी का स्थान कहाँ है? भारतीय बाजारों के लिए हिंदी कितने काम की है? क्या राजभाषा, राष्ट्रभाषा के द्वंद्व से निकलकर हिन्दी व्यवसाय की भाषा बन पायी है?

आँकड़े और अग्रजों के अनुभव से हमें पता चलता है कि पहले, आज से बीस-तीस साल पहले तक हिन्दी में विदेशी भाषा के पुस्तकों का अभाव होता था। साहित्य की किताब खोजने पर एक-आध भले अनुवादित विदेशी किताब मिल जाया करते थे लेकिन विज्ञान, टेक्नोलॉजी से सम्बन्धित किताबों का हिन्दी भाषा में अकाल-सा था। आज यह स्थिति नहीं है। हर साल अनेक विदेशी साहित्यकारों की कृतियों का हिन्दी भाषा में धड़ल्ले से अनुवाद हो रहा है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी ही क्या वाणिज्य और आईटी से संबंधित किताब भी आज हिंदी भाषा में उपलब्ध है। यह हिंदी भाषा से प्रेम की वज़ह से सम्भव हुआ है या बाजार की आर्थिक समझदारी यहां सक्रिय है, वज़ह कोई भी हो भाषा के रूप में आज हिन्दी का कद बढ़ता जा रहा है।

भारतीय बाजार एक निरंतर विकासशील होता बाजार है।बाजार का स्वरूप हो या आकार हर तरह से बदल रहा है. आज, सन् 2025, से एक-दो दशक पहले भला कोई यह कर सकता था कि घर बैठे, जो मन हो वह खरीद लेंगे। आज बाजार घर तक आ पहुंचा है। यह सहूलियत के साथ-साथ विकल्पों का भंडार भी ले आया। आपको एक टीवी खरीदना है। एक बार गूगल किए नहीं कि आपको हर प्लेटफार्म पर टीवी का प्रचार दिखने लगता है। तरह-तरह का टीवी। इतने ज्यादा विकल्प की आपका सिर ही चकरा जाये। अपने पसंद और जरूरत के हिसाब से आप कोई कम बजट वाला टीवी लेते लेकिन विज्ञापन और ऑफर के झांसे में कई गुना ज्यादा महंगा टीवी घर ले आते है। बाजार अपनी जरुरत के हिसाब से आपको पसंद करने के लिए मजबूर कर देता है।

अब सवाल आता है कि संवाद के बिना सौदा कहाँ ? अगर जेब खाली हो और बाजार निकले हैं तो मौन व्रत रख लेना बेहतर होता है। मौसम के हिसाब से भी बाजर लगते, उठते रहते हैं। ठंड आयी नहीं कि शहर में तरह-तरह के पोस्टर लग जाते हैं, ‘सस्ता, टिकाऊ, ऑरिजनल कश्मीरी शॉल’। बाजार कश्मीरी ऊन, स्वेटर, शॉल से भर जाता है। खाली मैदान बाजार बन जाते हैं। टेंट, तम्बू लगने लगते हैं, एक अस्थायी बाजार बन जाता है। शहर कुछ दिनों के लिए उसी में कैद हो जाता है। शाम को टहलने निकले तो एक बार उधर हो आते, सुबह दूध लेने गए तो एक चक्कर कश्मीरी बाजार का भी लगा आते हैं। इन दिनों हमारे संवाद में कश्मीरी सामान के साथ-साथ कश्मीरी शब्द और उनके लहज़े भी आने लगते हैं।

क्रेता-विक्रेता की अपनी-अपनी भाषा होती है। यह भाषा जब तक अलग-अलग होती है बिक्री मंदा होता है। जैसे ही विक्रेता क्रेता की भाषा को समझ लेता है, उसे अपना लेता है, वैसे ही बाजार में रौनक छा जाती है। बाजार भले क्रेता की भाषा को अपना लेता है लेकिन कहीं न कहीं वह अपनी भाषा भी क्रेता को समझाता चलता है।
भारतीय बाजार की भाषा को समझना हो तो इसका सबसे सरल तरीका है कि उस बाजार से संबंधित विज्ञापन को देखा जाये। विज्ञापन की भाषा बाजार की भाषा होती है और बाजार की भाषा विज्ञापन की। भारतीय बाज़ार अपनी भाषा से उपभोक्ताओं को अपनेपन, सहजता और आत्मीयता का अनुभव कराता है, जैसे:- “घर जैसा खाना”, “दादी के नुस्खे”, “सपनों का घर”, ये भावनात्मक वाक्य प्रभाव डालते हैं। मसालों के विज्ञापन पर एक नज़र डालें, “MDH – MDH – मसाले सच-सच, MDH”, “स्वाद भारत का” (Everest), “हर स्वाद में इंडिया” (Catch), “शुद्धता का प्रमाण”(Patanjali) आदि। यहां विज्ञापन की भाषा स्वाद और विश्वशनीयता की गारंटी है। हालांकि आज यह सवाल मौजूं है कि भारतीय बाजारों में हिंदी भाषा कहाँ है? क्या यह उपेक्षित है या इसको इग्नोर करना बाजार के लिए असंभव है?

दुनिया भर में लगभग 70-80 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं, जिससे यह विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा बन जाती है। भारत में, लगभग 528 मिलियन लोग हिंदी को अपनी मातृभाषा के रूप में बोलते हैं, और लगभग 139 मिलियन लोग इसे दूसरी भाषा के रूप में उपयोग करते हैं। यह संख्या बाजार के लिए समृद्धि सूचक है। बाजार अपनी तरफ से हर सम्भव प्रयास करता है कि इस विशाल हिंदी भाषी जनसंख्या को अपनी और आकर्षित कर। इसके लिए सबसे आसान तरीका है कि वह उपभोक्ता तक उनकी भाषा में पहुंचे।

बाजार की सिर्फ एक मातृभाषा होती है, और वह होती है खरीदार की मातृभाषा। देश में सर्वाधिक जनसंख्या हिन्दी बोलने, समझने वाली जनता की है। बाजार इस तथ्य को भलीभांति जानता है। आज हम अधिकांश फ़िल्में, चाहे वह साउथ इंडियन फिल्म हो या विदेशी फिल्म उन का हिन्दी डब देख पाते हैं। आखिर क्यों? उपभोक्ता संख्या। बाजार इस संख्या बल को जानता है। मुनाफा कमाना है तो आना ही होगा उन्हें हिन्दी के अंगना में। लेकिन यह आना अनायास नहीं है। जब यादृच्छिक रूप से कोई कार्य होता है तो उसमें नैसर्गिकता की खुशबू बसी होती है। लेकिन जब आना ही सायास हो फिर उसमें कृत्रिमता न हो ऐसा कैसे सम्भव?

बाजार अपने ग्राहक की संख्या देखता है, फिर अपने ग्राहक की सामाजिक-आर्थिक-साँस्कृतिक पृष्ठभूमि देखता है, लेकिन यह सब देखते हुए वह हमेशा अपने ग्राहक की भाषा पर अपना ध्यान केंद्रित रखता है। आखिर वह माध्यम भाषा ही है जिससे बाजार अपने तय ग्राहकों तक पहुंचता है। बाजार अपनी भाषा छोड़ अपने ग्राहक की भाषा को अपनाने से भी हिचकिचाता नहीं है। कैसे? आइए देखते हैं। कुछ दिनों से किताब प्रकाशित कराने हेतु विभिन्न सेल्फ पब्लिशिंग हाउस से बातचीत चल रही है। ऐसे ही एक प्रकाशन घर से बात हुई जो तमिलनाडु में स्थित है। उनकी भाषा तमिल है, अँग्रेजी भी बोलते हैं। मैं हिन्दी भाषी, बोलना तो मुश्किल है, समझ भले लेता हूँ अँग्रेजी। बातचीत के दरम्यान उनकी कोशिश होती है कि टूटी-फूटी हिन्दी ही सही लेकिन बोले, हालांकि जैसे हम हिन्दी बोलते समय एक-आध अँग्रेजी शब्द भी घुसा देते हैं, वैसे ही वे हिन्दी बोलते-बोलते दो चार भरा पूरा वाक्य अँग्रेजी के बोल जाते हैं। लेकिन उनका ध्यान हमेशा इसी पर होता है कि मैं समझा या नहीं। यहां क्रेता तक पहुंचने के लिए विक्रेता, बाजार अपनी भाषा से हटना भी सहज मानता है। जबकि हम देखते हैं कि आए दिन भाषा के आधार पर देश में विवाद होता ही रहता है। बाजार की यह भाषाई सहिष्णुता हमें भी तार्किक होने के लिए प्रेरित करता है। हमारे भेदभाव को दूर करता है।

किताबों का बाजार। अखबारों का साम्राज्य। मीडिया का एम्पायर। सबको तय करता है भाषा। कई भाषाओं के देश भारत में किस भाषा का अखबार सबसे ज्यादा बिकता है, किसके पास ज्यादा पाठक है, कौन है उपभोक्ता के मामले में नंबर वन? यह सवाल किसी से भी अगर आप पूछेंगे तो ज़वाब एक ही होगा, हिन्दी। मार्केट हिन्दी की उपयोगिता को समझ चुका है। खबर हो या न हो लेकिन अगर अखबार हिन्दी भाषा में निकल रहा है तो क्रेता न मिले ऐसा सम्भव ही नहीं। देश में सबसे ज्यादा बिकने वाले अख़बारों का नाम जब खोजा जाता है तो उसमें टॉप फाइव पर हिन्दी के अखबार ही अक्सर दिखते हैं। कभी दैनिक जागरण तो कभी दैनिक भास्कर तो कभी हिन्दुस्तान, अदल-बदल कर इनका ही क्रम ऊपर दिखता रहता है। एक समय था जब अंग्रेजी के अखबारों का वर्चस्व था, लेकिन था, अब ज़माना हिन्दी का है। बाजार हिन्दी का। यही हाल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का भी है। इंडिया टुडे ग्रुप का ही दो चैनल है, एक ‘आज तक’ दूसरा ‘इंडिया टुडे’। पहले की भाषा हिंदी है तो दूसरे की अँग्रेजी। यूट्यूब पर अगर इनके सब्सक्राइबर की संख्या देखेंगे तो एकबारगी चौंकेंगे तो जरूर ही। ‘आज तक’ का लगभग 73 मिलियन सब्सक्राइबर है, वहीं ‘इंडिया टुडे’ का बस 10 मिलियन। यह 7 गुना का अन्तर, हिन्दी को भारतीय बाजार की साम्राज्ञी की उपाधि देने से कौन रोक सकता है? यहां भी हिंदी भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बाजार के हालचाल को तय कर रहा है।

टीवी चैनल पर ख़बर से ज्यादा विज्ञापन देखने के हम आदि हो चुके थे। अब बारी है सोशल मीडिया की। खबर के बीच ही नहीं; दहाई, तिहाई, चौथाई में भी ख़बर के साथ विज्ञापन आने लगे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफार्म यूट्यूब पर न्यूज देख रहा था। अचानक एक विज्ञापन आया। भोजपुरी भाषा में। सर्फ का प्रचार था। कुछ इस तरह –“कपड़ा होई चमचम – निरमा बा हमार संग!” मैं चौंका। हिन्दी भाषा के अंतर्गत आने वाली उपभाषा भोजपुरी में विज्ञापन को देखना सुखद था। लेकिन एक सवाल यहां से उठता है कि क्या बाजार और विज्ञापन के क्षेत्र में हिंदी भाषा का स्थान घटता जा रहा है और प्रमुख बोली, उपभाषा उसका स्थान ले रहे हैं?
विज्ञापन बाजार को बनाता है तो बिगाड़ता भी। विज्ञापन की भाषा से हम आप समझ सकते हैं कि बाजार में किस भाषा का वर्चस्व है। भारतीय अँग्रेजी न्यूज चैनल को देखकर कुछ-कुछ इस वर्चस्व को समझा जा सकता है। वहां ख़बर के बीच में जो विज्ञापन आता है अक्सर वह हिंदी भाषा में होता है। टीवी चैनल भी जानते हैं कि कौन विज्ञापन दर्शक को बाजार तक लाने में सक्षम हैं।

वर्तमान में देश में क्रिकेट का बाजार सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। हज़ारों करोड़ के इस व्यवसाय में अगर हम हिन्दी भाषा का स्थान खोजे तो गौरवांवित होने के क्षण ज्यादा मिलेंगे हमें। हिन्दी कमेंटेटर जैसे सुनील गावस्कर, आकाश चोपड़ा, नवजोत सिंह सिद्धू, सहवाग का वर्चस्व आए दिन बढ़ रहा है। इनका अंदाज, इनकी शैली, इनकी मोहक भाषा दर्शकों पर नैसर्गिक छाप छोड़ती है। आए दिन इनका कमेन्ट वायरल होता रहता है। वहीं स्टार क्रिकेटर विराट, धोनी से लेकर सचिन तक हिन्दी में ही विज्ञापन करते देखे जाते हैं। आखिर क्यों? इनका फैन फाॅलोइंग इतना ज्यादा है कि ये किसी भी भाषा में विज्ञापन कर दें वह प्रोडक्ट पॉपुलर हो जाएगा। उसका बाजार बढ़ जाएगा। लेकिन नहीं। ये हिन्दी ही बोलते हैं। वज़ह है जनसंख्या। भाषा के प्रति भारतीय प्रशंसकों का भावनात्मक लगाव स्टार को भी भाषा के प्रति सजग करता है। हिन्दी बोलने वालों की संख्या देश में सर्वाधिक है और जब क्रिकेटर हिन्दी में विज्ञापन करेंगे तो उत्पाद ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचेगा, यह सामान्य समझ बाजार को है।

आइए देखते हैं एक विज्ञापन। ई-साइकिल का। क्या कहता है यह विज्ञापन, किस भाषा में कहता है, कौन है उस विज्ञापन का लीड हीरो? ई-साइकिल का विज्ञापन जिसका मुख्य किरदार क्रिकेटर धोनी है। उस विज्ञापन का लिप्यांतरण है:
धोनी – अब के बरस हाय ये सावन जान न मेरी ले जाए। बोले जो कोयल बागों में, बोले जो कोयल।
कोयल 1- क्या बोलेगा कोयल अभी। मस्त लग रहा है अपना माही भाई साइकिल पे ।
कोयल 2- हट... साइकिल नहीं, EMotorad है। पैडल भी और एक्सलेटर भी। बैटरी भी फोन जैसा चार्ज होता है ।
कोयल 1- क्या बात कर रहा है?
कोयल 2- हां तो और 70 किलोमीटर का रेंज भी देती है ।
कोयल 1- वाह ! गाना हो या इलेक्ट्रिक साइकिल माही भाई की चॉइस एक नंबर है हां।
कोयल 2- हां यार। थला फॉर ए रीजन।
धोनी – Emotorad इलेक्ट्रिक बाइक्स। दिल से आवाज आएगी...।

यहां क्या है, एक इलेक्ट्रॉनिक साइकिल का प्रचार है। उत्पादक इसके प्रचार के लिए प्रसिद्ध खिलाड़ी धोनी को चुना, भाषा हिंदी रखा, वह भी संपूर्ण भारत के लिए। हालांकि यहां प्रयुक्त हिन्दी आज के मध्यम वर्ग की बोलचाल वाली हिन्दी है। हिन्दी के साथ-साथ कुछ एक जगह अँग्रेजी। लेकिन आधार हिन्दी ही है। हम देख सकते हैं कि विक्रेता भारतीय बाजार के अनुरूप भाषा के रूप में हिन्दी को ही रखना उचित समझा। यह उदाहरण भारतीय बाजार में हिंदी की महत्ता को ही हमारे सामने ला रहा है।

आजकल हम आभासी होते जा रहे हैं। हमारी भाषा भी आभासी होते जा रही है। स्पोर्ट्स मार्केट शहर के युवाओं का पसंदीदा जगह होता है। कभी बैट खरीदने तो कभी बैडमिंटन खरीदने, कभी बस कोई नया हॉकी स्टिक आया है तो वह देखने निकल जाया करते हैं। बॉल के इतने नाम और आकार होते हैं बाजार में जाकर ही पता चला था हमें। वॉलीबॉल, फुटबॉल, टेनिस बॉल। समय बदला। अब युवा मोबाइल के प्ले स्टोर में जाने लगे हैं, तरह-तरह के गेम ऐप्लिकेशन डाउनलोड करने। फेसबुक पर जैसे ही देखते हैं कि हमारा दोस्त वॉर गेम के वीडियो डाल रहा है, अगले दिन वह गेम हमारे मोबाइल फोन में भी आ जाता है। जब से आईपीएल आया है एक नया दौर ही आ गया है। हमारे क्रिकेटर मैदान में दौड़ रहे होते हैं, उनका शारीरिक, मानसिक विकास हो रहा होता है और इधर हम ‘माइ 11 सर्कल’ एप, ‘ड्रीम 11’ एप पर अपना पैसा, दिमाग और मोटापा लगा रहे होते हैं। यह जुआ का आभासी धंधा है। होली-दिवाली में कुछ लोग सट्टा लगाते थे, अब आईपीएल में हर तबका इसके शिकार होते जा रहे हैं। यह सट्टा बाजार, आभासी बाजार का शहंशाह बनाता जा रहा है। यहां भी हिंदी ही युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करने का माध्यम बन रहा है। इन तरह-तरह के एप का विज्ञापन पॉपुलर क्रिकेटर से लेकर अभिनेता तक कर रहे हैं और विज्ञापन का माध्यम होता है हिन्दी। लत में डूबते हुए युवा के पीछे यह सट्टा बाजार है, स्टार हैं और है हमारी अपनी भाषा हिन्दी!

इन तरह-तरह के भारतीय बाजारों से गुजरने के बाद हम एक निष्कर्ष तक पहुंचे हैं कि हिन्दी के बिना हमारा भारतीय बाजार दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल, विवश है। बाजार तो होगा लेकिन खरीदार नहीं। हिन्दी भारतीय बाजारों की आत्मा है। इसे हटाकर भारतीय बाजारों की कल्पना तक नहीं की जा सकती है। लेकिन इतना मूल्यवान होते हुए भी क्या हिन्दी भारतीय बाजारों का प्रशासक है, क्या यह उत्पादकों की नीति निर्धारण प्रक्रिया में भी इतना ही महत्वपूर्ण है? सम्भवतः नहीं। क्रेता की भाषा जरूर हिन्दी है लेकिन बाजार की नीति नियंता की भाषा हिंदी नहीं है। जब से दुनिया ग्लोबल हुआ है, इसके बाजारों पर मल्टीनैशनल कंपनियों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। भारत में भी आज यही हो रहा है। अमेजन, फ्लिपकार्ट, टाटा, अडानी, अम्बानी, फेसबुक, निफ्टी, बीसीसीआई जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियां बाजार को नियंत्रित कर रही है। लेकिन इनकी भाषा क्या है? हिन्दी? नहीं। यहां बैठे बड़े-बड़े प्रशासक से लेकर छोटे-मोटे कर्मचारी तक, अधिकांश की भाषा अँग्रेजी है। ये अँग्रेजी भाषा-भाषी कंपनियां हिन्दी को केवल एक वस्तु की तरह देखते हैं। जितना ज्यादा से ज्यादा दोहन करके अपना फायदा वसूल लें यही इनका उद्देश्य होता है। इनको हिन्दी भाषा की अस्मिता, अस्तित्व, महत्वाकांक्षा से कोई लेना-देना नहीं है। इनकी वज़ह से हिन्दी संवरती है कि बिगड़ती है वह अपना हिन्दी जाने।