By Pooja Kumari
कल्पनाओं के आकाश में
विचारों के क्षितिज पर
क्यों आजकल उमड़-घुमड़ रहें हैं
विकास और विनाश !
गति ही जीवन है
लेकिन क्या गतिहीन होना भी जीवन है !
मार्च 2020 का समय था,
थे हम गतिहीन,
लेकिन हमारी गतिहीनता किसी के जीवन में
उत्साह का संचार कर रही थी।
सड़कें शान्त थीं,
लेकिन आसमां था उन्मुक्त पंछी से भरा।
सागर से नौका गायब थी,
पर मछलियाँ थी गतिशील।
शान्त सड़क, चंचल आसमान
एक जगह थी गतिहीनता तो दूसरी जगह गतिशीलता।
लेकिन कहीं था पेट भी खाली,
फ़िर कहाँ है जीवन ?
गतिशीलता में या गतिहीनता में !
चमचमाती कारें देख
फैलती आंखें
फ़िर,
फुटपाथ पर सोता देह देख
सिकुड़ती आंखें
क्या यही है विकास !
साफ़ आसमान, बन्द फैक्ट्रियाँ
गन्दला आसमान,खुली फैक्ट्रियाँ
हरा-भरा जंगल, घास पर पदचाप,
कटे पेड़, इठलाती सड़कें
क्या है विकास, क्या है विनाश?

